वसीयत
चीफ इंजिनियर मिश्र
को PWD से रिटायर हुए दस वर्ष हो चुके थे.नयी दिल्ली के पोश एरिया के एक अपार्टमेंट में उनका एक तीन बेडरूम का आलीशान
फ्लैट था .उनकी पत्नी का लगभग पांच वर्ष पूर्व देहांत हो चुका था.बेटी और दामाद
लन्दन में सेटल्ड थे और विवाहित बेटा यू एस की एक मल्टी नेशनल कंपनी में अच्छे
पैकेज पर लगा हुआ था .जब पत्नी जीवित थी तो वे अक्सर बच्चों के पास जब भी जाया
करते थे तो दोस्त यार पूछा करते थे क्या IAS ज्वाइन कर ली है ,वो समझ नहीं पाते थे
कि इसका क्या मतलब है .फिर दोस्त हसकर बताते कि इसका मतलब है ‘इंडियन आया सर्विसेज’.विदेश
में बच्चों को माता पिता की याद तभी आती है जब उनके यहाँ बच्चा होने वाला होता है तब
उन्हें एक आया की जरूरत पड़ती है. मिश्रजी इस पर मुस्करा भर देते थे .
अब वो निपट अकेले थे
,बच्चों के यदाकदा फ़ोन आ जाया करते थे पर इतने से अकेलापन तो नहीं कट सकता .पार्क
की बेंच पर अक्सर अकेले बैठे दीखते थे ,कभी कभी तो लोगों ने उनको रोते हुए भी देखा
था .किस से क्या बात करे ?महानगरीय संस्कृति में किसी को किसी से बात करने का कोई
समय नहीं है .अब वो अक्सर बीमार रहने लगे थे और एक दिन उनके फ्लैट से बदबू आते देख
कर सोसाइटी के पदाधिकारियों की उपस्थिति में फ्लैट का दरवाजा तोडा गया तो देखा कि मिश्रजी
की आत्मा तो चार दिन पहले ही शरीर से मुक्त हो चुकी है .तुरन्त उनके बच्चों को
विदेश में फ़ोन करके वस्तुस्तिथि से अवगत कराया गया .बेटे ने फ़ोन पर बताया वो अभी
पिता के क्रियाकर्म के लिए नहीं आ सकता ,बेटी से बात करने पर उसने भी यही कहा कि
अभी वो बहुत व्यस्त है और आने में असमर्थ है .उन दोनों बच्चों ने सोसाइटी अध्यक्ष से
यह भी निवेदन किया की पिता के पार्थिव शरीर को किसी मार्चुरी के फ्रीजर में रखवा
दे जब भी उन्हें समय मिलेगा वो आकर स्वर्गीय पिता का दाह संस्कार कर देंगे . मिश्रजी का शरीर इतना क्षतिग्रस्त हो चुका था कि
उसका सोसाइटी के द्वारा तुरंत दाहसंस्कार करना पडा .
मिश्रजी के देहांत
के लगभग पंद्रह दिनों के पश्चात उनके पुत्र व पुत्री दोनों आ गए और और दाह संस्कार
के बारे में सुनकर बेटा तो तुरन्त तैश में आ गया और सोसाइटी अध्यक्ष को पुलिस में
रिपोर्ट लिखवाने की धमकी देने लगा . सोसाइटी अध्यक्ष बेटे का अनर्गल प्रलाप सुनकर
क्रोध में आ गए और उन्होंने कहा “उल्लू के पट्ठे ! तुम कमीनों को जब इत्तला की तो
तुम्हारे पास बाप का किरिया करम करने का टाइम नहीं था और उनका शरीर इतना सड़ चुका
था कि सोसाइटी को उसका किरिया करम करना पड़ा .बजाय इसके कि तुम सोसाइटी का एहसान
मानो ,हमें गाली दे रहे हो ?तुम्हारा बाप यहीं पार्क की बेंच पर बैठा बैठा रोया
करता था और आजतक तुम लोगों ने उसकी कभी खबर नहीं ली और आज तुम हमें गाली दे रहे हो
.जाओ जहाँ भी रिपोर्ट लिखवानी है लिखवा दो हमें कोई परवाह नहीं है “
यह सुन
कर जब दोनों जाने के लिए मुड़े तो सोसाइटी अध्यक्ष ने उन्हें बुलाकर कहा “जा रहे हो?जाते
जाते अपने बाप की वसीयत जो सोसाइटी के पास छोड़ गया है वो तो सुनते जाओ! “ यह सुन
कर दोनों की आँखों में थोड़ी चमक आ गयी और वसीयत सुनने के लिए रुक गए .सबके सामने सोसाइटी
अध्यक्ष ने वसीयत को खोला और पढना शुरू किया “ मेरे दोनों बच्चों को मेरी जायदाद
से एक धेला भी ना दिया जाये ,मेरा फ्लैट एवं जितनी जमा पूँजी है वो मैं सोसाइटी के
नाम कर के जा रहा हूँ “
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ReplyDeleteVery touching story. This is happening, even to those also, whose kids are located in India.
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