Friday, February 13, 2015

अमूल्य भेंट

रोहन जब भी  शिप से घर आता था एक चक्कर वो बालिका अनाथालय का अवश्य लगा लिया करता था .उस अनाथालय से एक ऐसा नाता जुड़ गया था कि उसके परिवार के सदस्य भी हर पर्व पर वहां जरूर जा कर उनकी आवश्यकताओं को पूछ कर पूरा करने का प्रयास करते थे.यह एक ऐसा स्नेहपूर्ण बंधन था जिसको शब्दों में वर्णन करना बहुत मुश्किल है .यह अनाथालय ऐसा था जहाँ पर एक वर्ष से लेकर बीस वर्ष तक की कन्याओं का भरण पोषण एक ट्रस्ट द्वारा जो कि लोगों के दान पर चलता था , के द्वारा किया जाता था .इस अनाथालय में लगभग पच्चीस कन्यायें थी ,और एक महिला सुपरवाइजर जो कि मुस्लिम होते हुए भी कन्याओं को हिन्दू रीति रिवाजों के अनुसार पाल रही थी .रोहन को याद था किस प्रकार उसकी बीमार माँ का पचपनवा जन्मदिन इसी अनाथालय में सभी बालिकाओं ने हैप्पी बर्थडे टू डिअर आंटी एक स्वर में गाकर मनाया था .
इस बार जब रोहन शिप से लौटा तो एक दिन अपनी मुहबोली बहनों से मिलने अनाथालय गया और उनसे उनकी जरूरत का सामान पूछा .ऐसा प्रतीत होता था कि वे सब पहले से तैयार बैठी थीं . उन सब लड़कियों ने अपनी सभी पाठ्य पुस्तकों की कुंजियों की लिस्ट रोहन के हाथ में थमा दी .रोहन बेचारा सारे दिन किताबों की दुकानों पर घूम घूम कर सारी कुंजियाँ एकत्र की और एक बहुत बड़े थैले में सारी किताबें भर कर अनाथालय पहुंचा . अनाथालय की लड़कियों की तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी हो ,उनकी आँखों में कृतज्ञता की चमक और ख़ुशी देख कर रोहन की सारी थकान गायब हो गयी . जैसे ही वो वापस जाने को हुआ एक छोटी सी बच्ची ने आवाज़ दी ,कहा ‘ भैय्या जरा रुकना ‘ और वो भाग कर अंदर गयी और उसने रोहन को एक रुमाल भेंट किया जिस पर कढ़ाई कर के लिखा हुआ था “ प्यारे भैय्या”
रोहन आज भी अपने जीवन की सबसे अमूल्य भेंट समझ कर उस रुमाल को संभाल कर रखे हुए है ,यही रुमाल उसे सदैव दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित करता रहता है.

1 comment:

  1. It is always difficult to write and connect with the reader in simple words...you have achieved that brilliant quality in your writing. ..very touching

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