समीर ने अपने जन्म दिन पर फरमाइश की कि मुझे एक
रिस्ट वाच चाहिए। उसके पापा उसे बहुत
प्यार करते थे और बेटे को निराश नहीं करना चाहते थे। अपने सीमित साधनो में जिस
प्रकार की घडी संभव हो सकती थी ,वो
उसको ले दी। समीर घडी पाकर बहुत खुश था और अपनी कलाई को दोस्तों से छुपाता घूम रहा
था ताकि दोस्त उस से कारण पूंछे और वो अपनी नयी घडी उन्हें दिखाए। समीर टेबल टेनिस
का बहुत अच्छा खिलाडी था और अपने एज ग्रुप में वह स्टेट लेवल तक खेल चुका था। इसी आधार पर उसका चयन 'नेहरू बाल संघ' के नेहरूजी के जन्मशती समारोह नई
दिल्ली हेतु हो गया था. अब चूंकि पहली बार घर से निकल रहा था सभी को उसकी चिंता
थी। दिल्ली में उसके मामा को उसके जाने की सूचना भी दे दी गयी थी. दिल्ली पहुँचने
पर उसकी भारत के सभी प्रदेशों से आये हुए बच्चों से मुलाक़ात हुई और कइयों से तो
उसकी घनिष्ठता भी हो गयी थी। बहुत ही खुश
था समीर। अपनी प्यारी घडी को वो साथ में ले जाना नहीं भूला ,और सभी नए दोस्तों को वह अपनी घडी जरूर
दिखाता था। यह उन दिनों की बात है जब न तो मोबाइल फोन होते थे और न ही सब के पास
कलाई घडी।
उसके पिता को जब तीन चार दिन तक उसकी कोई सूचना
नहीं मिली तो उन्होंने अपने साले को पीसीओ से फोन लगाया और आग्रह किया कि जा कर
समीर का कुशल क्षेम प्राप्त कर सूचना दे।
उसी दिन शाम को साले साहब का फोन आया और उन्होंने बताया समीर बहुत मजे में
है खुश है लेकिन बहुत चिंता में भी है। पूछने पर उन्होंने बताया कि उसकी नयी घडी
चोरी हो गयी है और वो बहुत टेंशन में था कि पापा जिन्होंने बड़े जतन से घडी लेकर दी
थी वो क्या कहेंगे।
उसकी टेंशन की बात सुनकर उसके पापा भी टेंशन में आ गए और सोचने लगे यह इतनी बड़ी बात
तो नहीं है जिसके लिए पूरा ट्रिप खराब कर लिया जाए।
आज समीर दिल्ली से रेल से वापस आ रहा था और
पापा उसे लेने प्लेटफार्म पर पहुंचे हुए थे।
ट्रेन से उतर कर पापा के गले लग गया।
अचानक उसने नोटिस किया की पापा जो
सदैव अपनी घडी पहन कर रखते थे वो उनकी कलाई पर नहीं थी। उसने पूछा पापा आपकी घडी
कहाँ गयी ,पापा
ने बताया कि घडी पता नहीं कहाँ खो गयी है
और तीन दिन से मिल नहीं रही है। इतना
सुनकर समीर बोला 'पापा
मेरी भी घडी गुम हो गयी है , पता
नहीं किसने कैंप में चुरा ली है '
अब वो टेंशन मुक्त था और सोच रहा था की जब पापा की घडी गुम हो सकती
है तो मेरी क्यों नहीं। यह तो उसे बहुत बादमें पता चला की पापा ने उसे टेंशन मुक्त
करने के लिए ही यह नाटक किया था.
रवींद्र जी यह जान कर खुशी हुई कि आप कलाकार के अतिरिक्त कथाकार भी है इस लघु कथा के विषय वस्तु के साथ एक नया शब्द सीखने को मिला । पापा ने उसे टेंशन मुक्त करने के लिए ही यह नाटक किया था. । naatak kare kintu negativity vaale shabd se bachaa jaa sakataa hai
ReplyDeleteयदि नाटक भले काम के लिए किया जाय तो यह "नेगेटिव" कैसे कहलायेगा !
Delete