आज रोहन अपनी शिपिंग
की ट्रेनिंग पर छट्टियों के बाद कोलकाता पंहुचा था ,घर से माँ के बनाए हुए आलू के
पराठे भी ले गया था.ये पराठे खुद भी उसे बहुत पसंद थे और दोस्तों की फरमाइश भी
थी.जैसे ही रोहन पंहुचा सारे दोस्त उसके सामान में खाने की चीज़ें ढूँढने लगे ,एक
बंगाली सहपाठी स्वप्निल के हाथ वो पराठे लग गए और उसने वे चारो पराठे एक साथ मुह
में डाल लिए जिस से कि वो सब जूठे हो जाये और कोई ना खा
पाए .लेकिन आलू के घर के पराठे जैसे भी हो कोई नहीं छोड़ने वाला था ,सबने स्वप्निल
को पकड़ कर उस से पराठे छीन कर जितना भी जिसके हिस्से में आया ,खा लिया .इन दोस्तों को माँ
के पराठे छीनते देख रोहन
को माँ के ऊपर लिखी एक कविता याद आ रही थी –
तेरे डिब्बे की वो दो रोटियाँ…कहीं बिकती नहीं..
माँ, महंगे होटलों में आज भी.. भूख मिटती नहीं…
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