छोटी बेटी एक दिन स्कूल से घर पहुँचते ही बस्ता फेक कर जोर जोर से
रोने लगी। बहुत पूछने पर बताया की स्कूल जाते समय रास्ते में एक बहुत खूबसूरत
बंगला बन रहा है। मैं ,दीदी
और उसकी सहेली रोज उस बंगले को देखते हैं। आज तो हद ही हो गयी जब दीदी और उसकी
सहेली ने दो सुन्दर से दिखने वाले कमरों को पसंद कर के ये कहा कि ये दोनों कमरे तो
हम दोनों रखेंगे और मुझे एक सडा सा कमरा दे दिया है। अब उस छोटे बच्चे को मैं कैसे
समझाऊं की यथार्थ और यथार्थभासी में बहुत अंतर होता है।बेटी की निश्छल निष्कपट मासूमियत देख कर एक सुन्दर सी कविता याद आ गयी -
बच्चे
देखे गए सपनों से
निकालते हैं नए सपने
जैसे
उसी कपड़े से निकालते हैं धागा
फटे के रफू के लिए।
कागज़ की
हवाई जहाज की फूँक उड़ान में
उड़ते देखते हैं अपने स्वप्नों का जहाज।
रेत के घरौंदे में
देखते हैं अपना पूरा घर।
वे
खेल-खेल में
खेलते हैं जीवन
और
हम सब
जीवन में खेलते हैं खेल।
बच्चे
देखे गए सपनों से
निकालते हैं नए सपने
जैसे
उसी कपड़े से निकालते हैं धागा
फटे के रफू के लिए।
कागज़ की
हवाई जहाज की फूँक उड़ान में
उड़ते देखते हैं अपने स्वप्नों का जहाज।
रेत के घरौंदे में
देखते हैं अपना पूरा घर।
वे
खेल-खेल में
खेलते हैं जीवन
और
हम सब
जीवन में खेलते हैं खेल।
रवींद्र जी यह जान कर खुशी हुई कि आप कलाकार के अतिरिक्त कथाकार भी है इस लघु कथा के विषय वस्तु के साथ एक नया शब्द सीखने को मिला । यथार्थभाषी । बधायी हो
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