Monday, February 16, 2015

तपस्या


                                    तपस्या

“अब आप इस बच्चे का क्या करोगे ?” तमिलनाडु एक्सप्रेस में वीर के साथ बैठे हुए पैसेंजर ने पूछा .वीर जो कि अपने बेटे को जिसकी कि एक आँख में गहरी चोट लग गयी थी , को मद्रास के शंकर नेत्रालय में बेटे की आँख बचाने की आखिरी कोशिश करने आया था और नेत्रालय द्वारा जवाब देने के उपरांत ,कुछ निराश सा वापस लौट रहा था .अचानक तन्द्रा से जागा वीर और उसने उत्तर दिया “मैं इस बच्चे को इतना काबिल बना दूंगा कि दुनिया इसकी आँख की तरफ देखेगी भी नहीं”.
उसके बाद वीर का पूरा जीवन ही बदल गया . वो रात को मुश्किल से दो घंटे ही सो पाता था बाकी समय उसने कंप्यूटर की हर प्रकार की प्रोग्रामिंग को सीखने में लगा दिया .इस काम में उसकी निम्न आर्थिक स्थिति भी आड़े ना आ सकी .यह वह समय था जब भारत में कंप्यूटर नया नया आया था और बहुत ही कम लोग इसके बारे में जानते थे .उसने अपने प्रोविडेंट फण्ड एवं अन्य स्त्रोतों से ऋण ले कर एक कंप्यूटर खरीदा . सम्बंधित पुस्तके भी कम मंहगी ना थीं ,परन्तु उसने हिम्मत ना हारी .भारत में कोई भी कंप्यूटर सम्बन्धी पुस्तक प्रकाशित होती ,उसे वो खरीदता जरूर था .वीर जितना भी ज्ञान प्राप्त करता उसे अपने बेटे से शेयर करता और उसे भी धीरे धीरे इस विधा में निपुण बनाने का प्रयास करता .बेटा भी पिता का मंतव्य समझ कर पूरी लगन से अपनी स्कूल की पढाई के साथ साथ कंप्यूटर ज्ञान प्राप्त करने में लग गया .
इस बात को लगभग पांच वर्ष बीत गए थे ,बेटा भी अब  अपने पिता की भांति कंप्यूटर की हर प्रकार की प्रोग्रामिंग में निपुण हो चुका था एवं आज किसी बड़ी आई टी कंपनी में उसका इंटरव्यू था .उसकी निपुणता से प्रभावित हो कर कंपनी वालों उसे अच्छी सैलरी पर उसे अच्छे पद पर रख लिया . आज वीर अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रहा था .उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था .उसने यह बात अपने मित्र रोबिन से शेयर की तो रोबिन ने प्रत्युत्तर में कहा “वीर आज तुम्हारी बरसों की तपस्या सफल हो गयी “. यह सुन कर वीर की आँखों में आंसू आ गए और बोला “मेरे कान इस बात को सुनने के लिए तरस रहे थे “
दस वर्षों के बाद  वीर का फ़ोन रोबिन को आया था ,बहुत ही खुश था वो .उसका बेटा जो कि वर्तमान में किसी विदेशी कंपनी में २६ लाख वार्षिक के पैकेज पर लगा हुआ था ,उसे यू एस की एक कंपनी ने एक लाख सत्रह हजार डॉलर वार्षिक का ऑफर दिया है जिसे कि उसने स्वीकार कर , जाने की तैय्यारी शुरू कर दी है.रोबिन को उसकी ख़ुशी भरी आवाज़ के पीछे इस उम्र में अपना वतन छोड़ने का दर्द भी महसूस हो रहा था                                  

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