Friday, February 13, 2015

मीठे फल

नेहा का एडमिशन देश के विख्यात विश्वविद्यालय में हो गया था। पहली बार घर से दूर जा रही थी। उसके पास माता पिता के द्वारा दिए गए संस्कारों की पूँजी के अतिरिक्त बहुत कुछ नहीं था। उसके पिता एक बेहद ही ईमानदार,सत्यनिष्ठ ,अनुशासित अधिकारी थे एवं उन्होंने अपने बच्चों को भी यही संस्कार दिए थे। शुरू शुरू में तो कॉलेज में बहुत अच्छा लग रहा था। नया वातावरण , नए दोस्त ,सहेलियां, मेस के खाने का नया स्वाद। परन्तु कुछ दिनों के बाद घर की, घर के खाने की याद सताने लगी। वो माँ के हाथ के मूली के पराठे , वो राजमा चावल और यहाँ पतला पानी दाल , बेस्वाद सब्जियां ! एक दो बार मेस के खाने का विरोध किया ,तो सभी ने उसका साथ दिया क्योंकि आगे कोई नहीं आना चाहता था। सभी को लगा की नेहा को आगे किया जाय। सब ने मिल कर नेहा को मेस सेक्रेटरी चुन लिया। अब तो नेहा ने मेस के सभी कार्यकलापों में रूचि लेना प्रारम्भ कर दिया। धीरे धीरे मेस का खाना भी सुधरने लगा। नेहा ने मेस के सभी विभागों की निगरानी भी शुरू कर दी थी , इसका परिणाम यह हुआ की मेस की सब्जी फल आदि के सप्लायर भी परेशान रहने लगे। इन्ही सप्लायरों में एक प्रह्लाद नाम का सप्लायर भी था जिसका धंधा था मेस को सबस्टैंडर्ड फल सब्जी सप्लाई करना। मेस मैनेजर को खुश करके वो अपना धधा चला रहा था परन्तु नेहा की दखलंदाजी ने उसका धंधा मंदा कर दिया था। एक बार उसने मेस मैनेजर से पूछा की कौन है नयी मेस सेक्रटरी?उसके द्वारा यह बताने पर कि नेहा खरबंदा ही है जो मेस की सभी गतिविधयों पर निगाह रखे हुए है , बहुत खुश हो गया। कहने लगा " अब चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा "
एक दिन प्रह्लाद नाम पूछता हुआ हॉस्टल में आया और नेहा से बहुत गर्मजोशी से मिलते हुए उसने कहा कि नेहा से मिलकर बहुत ख़ुशी हुई। उसने कहा " बेटी तू भी पंजाबी है और मैं भी पंजाबी और तू तो अब मेरी बेटी है , चिंता मत कर , तेरी मेस में अब मैं बिलकुल फ्रेश फल सब्जी दिया करूंगा "
धीरे धीरे फल सब्जी आदि की गुणवत्ता में सुधार भी होने लगा। मेस में खाने वाले सभी विद्यार्थी भी खुश थे। 
एक दिन प्रह्लाद एक फल की टोकरी लिए हुए नेहा के कमरे पर पहुंचा और कहा बेटी ये रख ले ,अपनी सेहत का ख्याल रख। घर से दूर रहकर पढ़ाई के अलावा सेहत भी बहुत जरूरी है। और धीरे धीरे फलों की टोकरियाँ नेहा के कमरे पर ज्यादा और मेस में कम होती गयी। नेहा भी खुश थी की यहाँ पर भी उसका ख्याल रखने वाला एक चाचा मिल गया था। 
बड़े दिनों की छुट्टियों में नेहा घर आयी और पापा के पूछने पर कॉलेज की सारी गतिविधयों से अवगत कराया। फिर अचानक उसने पापा से पूछा कि क्या प्रह्लाद से फल लेना भी रिश्वत है। 
पापा ने कहा, 'हाँ बेटा प्रहलाद से फल लेना भी रिश्वत है, क्योंकि उसका मकसद तुम्हारी सेहत बनाना नहीं है, बल्कि मीठे फल खिला कर तुम्हारी आँखों में मीठी पट्टी बाँधना है, ताकि भविष्य में जब वह खराब, सड़ीगली सब्जियां मेस में भेजेगा तो या तो तुमको खराबी दिखाई नहीं देगी, या फिर तुम उसके खिलाए फलों के बोझ से इतना दब चुकी होगी, की कुछ कह ना सकोगी.
'
पर पापा अब मैं उनको मना कैसे करूं कि मुझे फल ना भेजा करें?' नेहा ने असमंजस भरे शब्दों में पूछा.पापा ने उसे बड़ी अच्छी बात बताई. उन्होंने कहा, 'बेटा ऐसे अवसरों पर एक बार बुरा बन जाने से अपना कुछ बिगड़ता नहीं पर दूसरों का भला अवश्य हो जाता है. मतलब प्रहलाद से एक बार कड़क शब्दों में कह दो, 'अंकल प्लीज आप मुझे फल भेजना बंद कर दो.' यदि वह कुछ और बहाना बनाए तो उसको कहना, 'यदि आप मेरी बात ना माने तो मुझे मजबूरन आपका फल सब्जी सप्प्लाई का ठेका बंद करना पडेगा.'
नेहा जब छुट्टियों के बाद कालेज पहुंची तो उसकी समझदारी पहले से ज्यादा बढ़ी हुई थी। इस बार जब प्रह्लाद फलों की टोकरी ले कर आया तो सहेलियों द्वारा रोकने एक बाद भी उसने फल लेने से इंकार कर दिया और कड़क शब्दों में उसे मना भी कर दिया। अब वो समझ चुकी थी की प्रह्लाद ने कैसे उसे बेवकूफ बनाने का प्रयास किया था। उसने सर्वप्रथम उसे बुलाकर ,अबतक जो फल दिए थे उसका पूरा मूल्य चुकाया। 
प्रह्लाद भी अब समझ चुका था की उसका पाला एक ईमानदार पिता की पुत्री से पड़ा है।

1 comment:

  1. Love the simplistic layout of your blog..easy to explore. .btw this happens to be one of my favourite stories

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