Tuesday, February 24, 2015

पार्किन्सन

                        पार्किन्सन

आदेश जी का पार्किन्सन काफी बढ़ गया था और उनकी पत्नी को अब उन्हें सम्भालने में बहुत परेशानी हो रही थी.वो बेचारी प्रतिदिन उनको जबरदस्ती ठेलती हुई घुमाने ले जाया करती थी . आदेश जी के शरीर में स्टिफनेस बढती जा रही थी . आदेश जी का खाना खाने की भी बहुत इच्छा नहीं करती थी .इस बीमारी की सबसे बड़ी समस्या तो ब्रेन की ही होती है और धीरे धीरे ब्रेन और शरीर का सामन्जस्य भी शिथिल होने लगता है .कभी कभी तोउनकी पत्नी उनको ,जब घूमने या खाना खाने के लिए बोलती तो वो लड़ना शुरू कर देते थे .डॉक्टरों के पास ले जाना ,उनको एक्सरसाइज कराना ,खाना खिलाना ही उनकी पत्नी की पूर्णकालिक दिनचर्या बन गयी थी .उनकी पत्नी बहुत ही कर्मठ किस्म की नारी थी . सदैव मुस्कुराती रहती ,कभी अपने पति एवं अपने कष्टों को कभी भी दूसरों से शेयर नहीं करती थी .
आदेश जी के दो पुत्र थे और दोनों ही विवाहित थे एवं विदेशों में अच्छी जॉब पर लगे हुए थे और उनका एक पुत्र एवं पुत्र वधु दोनों ही डॉक्टर थे . दोनों बेटों को अपने माता पिता से बहुत स्नेह था . आदेश जी की पत्नी कभी भी अपने बच्चों को आदेश जी की बीमारी के बारे में बहुत ज्यादा नहीं बताती थी ,सोचती थी ,की दूर बैठे हुए हैं ,क्यों उनको कष्ट दिया जाए .एक दिन तो आदेश जी की यह हालत हो गयी कि चलते चलते रास्ते में एक दम से रुक गए और वहीँ पर पत्नी के सम्भालते सम्भालते गिर गए .किसी प्रकार एक कार वाले को रोक कर ,उसमे किसी प्रकार बैठा कर घर लाया गया .मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों से कंसल्ट किया गया ,उन्होंने सारे टेस्ट करने के बाद दवाइयां लिख दी .
इस बीच आदेश जी जिस अपार्टमेंट में रहते थे ,उसकी सोसाइटी के सेक्रेटरी से उनका हाल देखा नहीं गया और उसने उनके डॉक्टर बेटे को आदेश जी की गंभीर स्थिति के बारे में सूचित कर दिया .बेटा बेचारा यह सब सुन कर बहुत परेशान हो गया और तुरंत माँ से बात की और खूब लड़ा .फिर उसने अपनी डॉक्टर पत्नी से पिता की गंभीर स्थिति की चर्चा की तो उसकी पत्नी ने तुरंत अपने पति से कहा कि हमारे माँ बाप ने यही दिन देखने के लिए क्या हम लोगों को पढ़ा लिखा कर बड़ा किया था ,हमें तुरंत कुछ करना चाहिए .उसने अपने पति से कहा हम लोग विदेशों में डाक्टरी कर रहे है और हमारे माता पिता घर में कष्ट में हों ,यह कोई अच्छी बात तो नहीं है .पत्नी ने तुरंत अपने हॉस्पिटल से छुट्टी ली ,दिल्ली का टिकेट कटाया ,और दिल्ली आकर एक एयर एम्बुलेंस का प्रबंध किया और अपने सास ससुर को तैयार रहने के लिए बोल दिया . एयर एम्बुलेंस का हेलीकाप्टर जैसे ही अपार्टमेंट की छत पर उतरा ,सब लोग हैरान !जैसे ही पता चला सारे अपार्टमेंट वासी इकट्ठे हो गए .उनकी बहू ने विशेष रूप से सोसाइटी के सेक्रेटरी को सूचना देने के लिए आभार प्रकट किया .यह पूछने पर कि आदेश जी का बेटा क्यों नहीं आया ,तो बहू ने बताया वो पापा का हाल सुन कर रोने लगे ,उनकी हालत देख कर ही मैंने स्वयं आने का निर्णय लिया .यह पूछने पर कि अब क्या होगा ,तो बहू ने बताया कि  विदेश में जिस शहर में वो लोग रहते हैं वहां के बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट से अपॉइंटमेंट ले लिया गया है और वहां पहुँचते ही इलाज शुरू हो जाएगा .इलाज के खर्च के बारे में पूछने पर उसने कहा कि जितने भी पैसे खर्च हो जाएँ इसकी कोई परवाह नहीं .पैसा क्या माता पिता से बढ़ कर होता है .
एयर एम्बुलेंस का हेलीकाप्टर आदेश जी ,उनकी पत्नी  व बहू को लेकर जैसे ही उड़ने को हुआ ,सभी अपार्टमेंट वासियों ने शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामनाएं देते हुए उन्हें बिदा किया .उस समय सब के होठों पर एक ही बात थी “ऐसे बेटा बहू सब को दे “
इस बार जब होली के उत्सव पर सभी अपार्टमेंट वासी एकत्र हुए तो सोसाइटी के सेक्रेटरी ने सबको अवगत कराया कि विदेश में आदेश जी के ब्रेन की अत्याधुनिक विधि से सर्जरी करके एक स्टेंट लगा दिया गया है जिससे कि उनका पार्किन्सन लगभग ठीक हो गया है .उन्होंने यह भी बताया की आदेश जी अपने बेटे बहू नाती पोतों के साथ बहुत खुश हैं . सोसाइटी के सेक्रेटरी ने इस मौके पर बेटे पर लिखी निम्न चार पंक्तियाँ भी सुनाई-
 पिता के कंधो पर बैठ कर दुनिया को समझती जिज्ञासा है बेटे,
 तो कभी बूढ़े पिता को दवा, सहारा, सेवा सुश्रुषा है बेटे,
 पिता का अथाह विश्वास और परिवार का अभिमान है बेटे,
 भले कितने ही शैतान हो पर घर की पहचान है बेटे.” 

Monday, February 23, 2015

ऐसा भी होता है !

                      ऐसा भी होता है !

जिसने भी सुना वो दंग रह गया.श्री मोहन के साथ ऐसा हो गया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी . श्री मोहन एक बैंक में अधिकारी थे और एक ऋण विशेषीकृत शाखा के शाखा प्रबंधक भी थे .उनके  ऊपर क्षेत्रीय प्रबंधक की भी विशेष कृपा थी .हो भी क्यों ना ,आखिर दूध देने वाली गाय थी .श्री मोहन की सेटिंग क्षेत्रीय प्रबंधक के साथ बहुत बढ़िया थी ,उनकी शाखा को ऋण बजट के टारगेट भी जरूरत से ज्यादा दिए गए थे ताकि अधिक से अधिक ऋण हों और प्रबंधक तथा क्षेत्रीय प्रबंधक की आमदनी भी .यह वह समय था जब एक ट्रक ऋण पर लगभग रु १००००/-की अतिरिक्त आमदनी शाखा प्रबंधक कर सकता था .यही १००००/- क्षेत्रीय प्रबंधक एवं शाखा प्रबंधक के बीच में बटा करते थे .श्री मोहन की शाखा से धड़ाधड़  ट्रक लोन हो रहे थे और पूरे शहर में यह चर्चा आम थी कि चाहे जैसा भी  ट्रक लोन करवाना हो तो श्री मोहन की शाखा से करवाया जा सकता है . श्री मोहन,पैसा कमाने के चक्कर में,परिवार का ,अपने स्वास्थ्य आदि का भी कोई होश नहीं रहा था .इसी दौरान उनकी पत्नी ने नोटिस किया की उनकी भूख कुछ कम हो गयी है .पहले श्री मोहन चार रोटी खाते थे अब वो दूसरी रोटी पर भी ना नुकुर करने लगे थे .टोकने पर बोले की तुम्हे वहम हो गया है ,आजकल काम की चिंता ज्यादा है ,इसलिए भूख थोडा कम लग रही है .एक दिन जब श्री मोहन की पत्नी उनके अन्तः वस्त्र धो रही थी तो देखा कि उनके अंडरवियर और बनियान बिलकुल पीले हो गए थे .यह तो चिंता का विषय था ,उनको पीलिया (Jaundice) हो गया था .श्री मोहन को जब बताया तो उनका जवाब था “ ये कोई लाइलाज बीमारी तो है नहीं ,इसका इलाज हो जाएगा ,ज्यादा चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है .”उनकी सोच में यह था कि पैसे से सब कुछ हो सकता है यदि आदमी के पास पैसा हो तो सब कुछ संभव है .पैसे से ही आदमी की इज्जत है और आने वाली पीढियां भी खुशहाल रहती हैं .अभी तो वक्त है पैसा कमाने का .पहले खूब पैसा कमा लिया जाए बाद में सब देखा जयेगा.
  एक दिन लगभग दोपहर के १२ बजे ,बैंक का चपरासी घर में भागा भागा आया ,और बताया की साहब ऑफिस में बेहोश होकर गिर गए हैं .पत्नी बेचारी जवान बेटे को साथ लेकर ऑफिस पहुंची और एम्बुलेंस बुलाकर उनको शहर के सबसे बड़े हॉस्पिटल में दाखिल करवा दिया गया .डॉक्टरों की टीम ने उनका निरीक्षण करने के बाद बताया कि इनका jaundice लास्ट स्टेज पर आ गया है अर्थात उनको लीवर सिरोसिस हो गया था ,इनके लीवर ने बिलकुल काम करना बंद कर दिया है ,इनको तुरंत दिल्ली ले जाइये .एक टैक्सी में तुरंत उनको दिल्ली ले जाया गया और वहां के नामी हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया गया जहां पर . सभी रिश्तेदार,बेटियां ,दामाद आदि यहाँ हॉस्पिटल में पहुँच चुके थे . यहाँ पर भी उनकी हालत में बहुत सुधार नहीं हुआ और तीन दिनों के उपरान्त उनका निधन हो गया .सभी बिलों का भुगतान करने के पश्चात उनकी देह को मार्चुरी से लाकर हॉस्पिटल के  प्रांगण में रख दिया गया .उनकी पत्नी प्रतीक्षा कर रही थी कि कब शव वाहन को लाया जाय और उनकी देह को अंतिम संस्कार हेतु अपने शहर ले जाया जाय .देर होते देख वो हॉस्पिटल के गेट तक आयी तो देखा हॉस्पिटल के लॉन में भीड़ लगी हुई है और भीड़ के अंदर घुस कर जो उसने देखा तो उसके होश उड़ गए .उसके बेटे ,दामादों और बेटियों में स्वर्गीय मोहन जी की जायदाद के बटवारे को लेकर गुत्थमगुत्था हो रही थी .यह देखकर तो वो बेहोश होते बची .वह अपनी सारी उर्जा को एकत्रित करके जोर से चीखी “हराम जादो ,वो तुम्हारे लिए ही पैसे कमा रहा था,कम से कम उसके अंतिम संस्कार तक तो रुक जाते “ यह सुन कर उनके बेटे ने गुस्से से अपनी माँ को देखा और एक टैक्सी बुलाकर उसकी डिक्की में श्री मोहन की बॉडी को ठूसा और माँ को खींच कर उसमे बिठाकर ,अपने शहर रवाना हो गए .रास्ते भर माँ रोते रोते यही सोचती रही कि उनके पति ने आखिर क्या कमाई की ?क्या इन्ही बच्चों की ख़ुशी के लिए ही उसके पति यह सब कर रहे थे ?टैक्सी के आगे आगे एक ट्रक जा रहा था और उसके पीछे लिखा था -

“कैद कर दिया सापों को ये कहकर सपेरे ने.
 बस अब इन्सानों को डसने के लिये उसके अपने ही काफी है” 

Wednesday, February 18, 2015

वसीयत

                                          वसीयत 

चीफ इंजिनियर मिश्र को PWD से रिटायर हुए दस वर्ष हो चुके थे.नयी दिल्ली के पोश एरिया के एक  अपार्टमेंट में उनका एक तीन बेडरूम का आलीशान फ्लैट था .उनकी पत्नी का लगभग पांच वर्ष पूर्व देहांत हो चुका था.बेटी और दामाद लन्दन में सेटल्ड थे और विवाहित बेटा यू एस की एक मल्टी नेशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर लगा हुआ था .जब पत्नी जीवित थी तो वे अक्सर बच्चों के पास जब भी जाया करते थे तो दोस्त यार पूछा करते थे क्या IAS ज्वाइन कर ली है ,वो समझ नहीं पाते थे कि इसका क्या मतलब है .फिर दोस्त हसकर बताते कि इसका मतलब है ‘इंडियन आया सर्विसेज’.विदेश में बच्चों को माता पिता की याद तभी आती है जब उनके यहाँ बच्चा होने वाला होता है तब उन्हें एक आया की जरूरत पड़ती है. मिश्रजी इस पर मुस्करा भर देते थे .
अब वो निपट अकेले थे ,बच्चों के यदाकदा फ़ोन आ जाया करते थे पर इतने से अकेलापन तो नहीं कट सकता .पार्क की बेंच पर अक्सर अकेले बैठे दीखते थे ,कभी कभी तो लोगों ने उनको रोते हुए भी देखा था .किस से क्या बात करे ?महानगरीय संस्कृति में किसी को किसी से बात करने का कोई समय नहीं है .अब वो अक्सर बीमार रहने लगे थे और एक दिन उनके फ्लैट से बदबू आते देख कर सोसाइटी के पदाधिकारियों की उपस्थिति में फ्लैट का दरवाजा तोडा गया तो देखा कि मिश्रजी की आत्मा तो चार दिन पहले ही शरीर से मुक्त हो चुकी है .तुरन्त उनके बच्चों को विदेश में फ़ोन करके वस्तुस्तिथि से अवगत कराया गया .बेटे ने फ़ोन पर बताया वो अभी पिता के क्रियाकर्म के लिए नहीं आ सकता ,बेटी से बात करने पर उसने भी यही कहा कि अभी वो बहुत व्यस्त है और आने में असमर्थ है .उन दोनों बच्चों ने सोसाइटी अध्यक्ष से यह भी निवेदन किया की पिता के पार्थिव शरीर को किसी मार्चुरी के फ्रीजर में रखवा दे जब भी उन्हें समय मिलेगा वो आकर स्वर्गीय पिता का दाह संस्कार कर देंगे .  मिश्रजी का शरीर इतना क्षतिग्रस्त हो चुका था कि उसका सोसाइटी के द्वारा तुरंत दाहसंस्कार करना पडा .
मिश्रजी के देहांत के लगभग पंद्रह दिनों के पश्चात उनके पुत्र व पुत्री दोनों आ गए और और दाह संस्कार के बारे में सुनकर बेटा तो तुरन्त तैश में आ गया और सोसाइटी अध्यक्ष को पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने की धमकी देने लगा . सोसाइटी अध्यक्ष बेटे का अनर्गल प्रलाप सुनकर क्रोध में आ गए और उन्होंने कहा “उल्लू के पट्ठे ! तुम कमीनों को जब इत्तला की तो तुम्हारे पास बाप का किरिया करम करने का टाइम नहीं था और उनका शरीर इतना सड़ चुका था कि सोसाइटी को उसका किरिया करम करना पड़ा .बजाय इसके कि तुम सोसाइटी का एहसान मानो ,हमें गाली दे रहे हो ?तुम्हारा बाप यहीं पार्क की बेंच पर बैठा बैठा रोया करता था और आजतक तुम लोगों ने उसकी कभी खबर नहीं ली और आज तुम हमें गाली दे रहे हो .जाओ जहाँ भी रिपोर्ट लिखवानी है लिखवा दो हमें कोई परवाह नहीं है “
यह सुन कर जब दोनों जाने के लिए मुड़े तो सोसाइटी अध्यक्ष ने उन्हें बुलाकर कहा “जा रहे हो?जाते जाते अपने बाप की वसीयत जो सोसाइटी के पास छोड़ गया है वो तो सुनते जाओ! “ यह सुन कर दोनों की आँखों में थोड़ी चमक आ गयी और वसीयत सुनने के लिए रुक गए .सबके सामने सोसाइटी अध्यक्ष ने वसीयत को खोला और पढना शुरू किया “ मेरे दोनों बच्चों को मेरी जायदाद से एक धेला भी ना दिया जाये ,मेरा फ्लैट एवं जितनी जमा पूँजी है वो मैं सोसाइटी के नाम कर के जा रहा हूँ “ 

अन्धविश्वास

                               अन्धविश्वास


बच्चों के एडमिशन के लिए विभिन्न स्कूलों के फार्म निकल रहे थे ,मुझे भी अपनी छोटी बेटी का एडमिशन किसी अच्छे स्कूल में करवाना था परन्तु समझ में नहीं आ रहा था कहाँ करवाएं .एक दिन  मेरे एक अधीनस्थ क्लर्क ने मुझे बताया कि सर ! सैंट गोबैन जो कि शहर के प्रतिष्ठित स्कूलों में से एक था ,के फार्म निकले हैं और मैं उसे लेने जा रहा हूँ .मैंने कहा कि मुझे भी एक फार्म चाहिए ,तो उसने कहा कि आप को स्वयं ही चलना पड़ेगा .अतः हम दोनों एक ही स्कूटर पर बैठ कर निकल पड़े .थोड़ी ही दूर चले होंगे कि एक काली बिल्ली हमारा रास्ता काट गयी .यह देख कर मेरा क्लर्क तो सहम गया और बोला ,सर आज काम नहीं बनेगा .मैंने उस से कहा की आजकल के वैज्ञानिक युग में भी तुम इन बातों पर विश्वास करते हो ? खैर , किसी तरह स्कूल पहुचे और देखा कि फार्म लेने वालों की बहुत लम्बी लाइन लगी हुई है .हम भी लाइन में लग गए और मेरा क्लर्क मेरे पीछे खड़ा हो गया.लगभग आधे घंटे में हमारा भी नंबर आ गया और बेटी का नाम लिख कर स्कूल क्लर्क ने एक फार्म मुझे इशू कर दिया और इसके उपरांत स्कूल क्लर्क ने फार्म समाप्त होने की घोषणा भी कर दी .मेरा क्लर्क बेचारा हतप्रभ ! मैंने स्कूल क्लर्क से बहुत रिक्वेस्ट की कि प्लीज एक फार्म और दे दे परन्तु स्कूल क्लर्क ने बताया की फार्म वास्तव में समाप्त हो गए हैं और वो कुछ नहीं कर सकता.यह मात्र एक संयोग था जिसने कि मेरे क्लर्क के बिल्ली द्वारा रास्ता काटने के अन्धविश्वास को सच कर दिया जबकि बिल्ली ने रास्ता मेरा भी काटा था. 

Monday, February 16, 2015

तपस्या


                                    तपस्या

“अब आप इस बच्चे का क्या करोगे ?” तमिलनाडु एक्सप्रेस में वीर के साथ बैठे हुए पैसेंजर ने पूछा .वीर जो कि अपने बेटे को जिसकी कि एक आँख में गहरी चोट लग गयी थी , को मद्रास के शंकर नेत्रालय में बेटे की आँख बचाने की आखिरी कोशिश करने आया था और नेत्रालय द्वारा जवाब देने के उपरांत ,कुछ निराश सा वापस लौट रहा था .अचानक तन्द्रा से जागा वीर और उसने उत्तर दिया “मैं इस बच्चे को इतना काबिल बना दूंगा कि दुनिया इसकी आँख की तरफ देखेगी भी नहीं”.
उसके बाद वीर का पूरा जीवन ही बदल गया . वो रात को मुश्किल से दो घंटे ही सो पाता था बाकी समय उसने कंप्यूटर की हर प्रकार की प्रोग्रामिंग को सीखने में लगा दिया .इस काम में उसकी निम्न आर्थिक स्थिति भी आड़े ना आ सकी .यह वह समय था जब भारत में कंप्यूटर नया नया आया था और बहुत ही कम लोग इसके बारे में जानते थे .उसने अपने प्रोविडेंट फण्ड एवं अन्य स्त्रोतों से ऋण ले कर एक कंप्यूटर खरीदा . सम्बंधित पुस्तके भी कम मंहगी ना थीं ,परन्तु उसने हिम्मत ना हारी .भारत में कोई भी कंप्यूटर सम्बन्धी पुस्तक प्रकाशित होती ,उसे वो खरीदता जरूर था .वीर जितना भी ज्ञान प्राप्त करता उसे अपने बेटे से शेयर करता और उसे भी धीरे धीरे इस विधा में निपुण बनाने का प्रयास करता .बेटा भी पिता का मंतव्य समझ कर पूरी लगन से अपनी स्कूल की पढाई के साथ साथ कंप्यूटर ज्ञान प्राप्त करने में लग गया .
इस बात को लगभग पांच वर्ष बीत गए थे ,बेटा भी अब  अपने पिता की भांति कंप्यूटर की हर प्रकार की प्रोग्रामिंग में निपुण हो चुका था एवं आज किसी बड़ी आई टी कंपनी में उसका इंटरव्यू था .उसकी निपुणता से प्रभावित हो कर कंपनी वालों उसे अच्छी सैलरी पर उसे अच्छे पद पर रख लिया . आज वीर अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रहा था .उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था .उसने यह बात अपने मित्र रोबिन से शेयर की तो रोबिन ने प्रत्युत्तर में कहा “वीर आज तुम्हारी बरसों की तपस्या सफल हो गयी “. यह सुन कर वीर की आँखों में आंसू आ गए और बोला “मेरे कान इस बात को सुनने के लिए तरस रहे थे “
दस वर्षों के बाद  वीर का फ़ोन रोबिन को आया था ,बहुत ही खुश था वो .उसका बेटा जो कि वर्तमान में किसी विदेशी कंपनी में २६ लाख वार्षिक के पैकेज पर लगा हुआ था ,उसे यू एस की एक कंपनी ने एक लाख सत्रह हजार डॉलर वार्षिक का ऑफर दिया है जिसे कि उसने स्वीकार कर , जाने की तैय्यारी शुरू कर दी है.रोबिन को उसकी ख़ुशी भरी आवाज़ के पीछे इस उम्र में अपना वतन छोड़ने का दर्द भी महसूस हो रहा था                                  

Friday, February 13, 2015

यही है ज़िंदगी।

 ब्रिगेडियर राधे ,रिटायर हो कर अपने निजी घर में शिफ्ट कर गए थे.ज़िदगी भर आर्मी की सुख सुविधाओं एवं सलूट के उपरांत सिविल जीवन में सामन्जस्य बिठाने में उन्हें बहुत कठिनाइयाँ हो रही थी.कदम कदम पर हर महकमे जैसे नगर महापालिका, डाकघर ,टेलीफोन आदि में उनसे या तो डॉलर (रम की बोतल )मांगे जा रहे थे या सीधे सीधे पैसे .धीरे धीरे सारी चीजों को समझने की कोशिश कर रहे थे.अक्सर घर की घंटी बजती ,तो पता चलता की टेलीफोन विभाग का लाइन मैन फोन की लाइन स्वयं काट कर ठीक करने के बाद इस प्रतीक्षा में खड़ा है कि कुछ मिल जाय. इसी बीच होली आ गयी . इस त्यौहार के बाद तो इनाम लेने वालों की लाइन लग गयी .एक दिन तो हद हो गयी जब डाकिया ब्रिगेडियर राधे से होली की बक्शीश लेने के लिए आया ,उन्होंने सीधे सीधे उस से पूछा कि क्या उसे तनख्वाह नहीं मिलती है जो बक्शीश लेने आ गए हो ?उस समय तो वो चुपचाप चला गया .कुछ दिनों के बाद उन्होंने ने नोटिस किया कि उनकी कोई भी सरकारी एवं निजी चिठ्ठी नहीं आ रही है जिनकी कि सूचना उनके पास है .उन्होंने डाकिये से पूछा ,तो उसने टका सा जवाब दे दिया कि उसके पास उनकी कोई चिठ्ठी नहीं है .एक दिन उन्होंने देखा  कि घर के सामने वाली नाली में कुछ कागज़ फटे हुए पड़े हैं ,गौर से देखने पर पता चला की उनकी सभी चिट्ठियां जो की आर्डिनरी पोस्ट से आने वाली थी ,सब की सब नाली में पड़ी हुई थी.
और एक दिन तो हद ही हो गयी ,लेडी ब्रिगेडियर अपने किरायेदार  जो कि उनके निवास के एक पोर्शन में ही रहते थे , के पास आयी और कहने लगी की भय्या ब्रिगेडियर साहब को सम्भालो . पता करने पर मालूम पड़ा कि गली के स्वीपर को नाली ठीक से साफ़ करने को कह दिया .थोड़ी देर बाद वो कुछ इनाम की आस में गेट पर खड़ा हो गया ,पूछने पर पता चला कि नाली साफ़ कर दी है ,कुछ इनाम बक्शीश मिल जाय . ब्रिगेडियर साहब ने उस स्वीपर को अंदर अपने कमरे में बुलाया और कुण्डी अंदर से बंद कर के उसकी मिलिट्री बेल्ट से पिटाई शुरू कर दी .बड़ी मुश्किल से उस गली के स्वीपर को किरायेदार की सहायता से बचाया जा सका .इस का परिणाम यह हुआ की दुसरे दिन से गली की नाली की सफाई भी बंद हो गयी और स्वीपर ने इस गली में आना ही बंद कर दिया .कुछ दिनों में गली की नालियाँ बजबजाने लगी और आसपास के पड़ोसी कारण पता चलने पर इकट्ठे हो कर ब्रिगेडियर साहब के पास आये और उन्हें समझाया की मिलिटरी की लाइफ और यहाँ की लाइफ में बहुत अंतर है यहाँ रहना है तो यहाँ के नियमों का पालन भी करना पड़ेगा .यही है यहाँ की जिंदगी .

माँ

आज रोहन अपनी शिपिंग की ट्रेनिंग पर छट्टियों के बाद कोलकाता पंहुचा था ,घर से माँ के बनाए हुए आलू के पराठे भी ले गया था.ये पराठे खुद भी उसे बहुत पसंद थे और दोस्तों की फरमाइश भी थी.जैसे ही रोहन पंहुचा सारे दोस्त उसके सामान में खाने की चीज़ें ढूँढने लगे ,एक बंगाली सहपाठी स्वप्निल के हाथ वो पराठे लग गए और उसने वे चारो पराठे एक साथ मुह में डाल लिए जिस से कि वो सब जूठे हो जाये और कोई ना खा पाए .लेकिन आलू के घर के पराठे जैसे भी हो कोई नहीं छोड़ने वाला था ,सबने स्वप्निल को पकड़ कर उस से पराठे छीन कर जितना भी जिसके हिस्से में आया ,खा लिया .इन दोस्तों को माँ के पराठे छीनते देख रोहन को माँ के ऊपर लिखी एक कविता याद आ रही थी –



तेरे डिब्बे की वो दो रोटियाँ…कहीं बिकती नहीं..
माँ, महंगे होटलों में आज भी.. भूख मिटती नहीं…

अमूल्य भेंट

रोहन जब भी  शिप से घर आता था एक चक्कर वो बालिका अनाथालय का अवश्य लगा लिया करता था .उस अनाथालय से एक ऐसा नाता जुड़ गया था कि उसके परिवार के सदस्य भी हर पर्व पर वहां जरूर जा कर उनकी आवश्यकताओं को पूछ कर पूरा करने का प्रयास करते थे.यह एक ऐसा स्नेहपूर्ण बंधन था जिसको शब्दों में वर्णन करना बहुत मुश्किल है .यह अनाथालय ऐसा था जहाँ पर एक वर्ष से लेकर बीस वर्ष तक की कन्याओं का भरण पोषण एक ट्रस्ट द्वारा जो कि लोगों के दान पर चलता था , के द्वारा किया जाता था .इस अनाथालय में लगभग पच्चीस कन्यायें थी ,और एक महिला सुपरवाइजर जो कि मुस्लिम होते हुए भी कन्याओं को हिन्दू रीति रिवाजों के अनुसार पाल रही थी .रोहन को याद था किस प्रकार उसकी बीमार माँ का पचपनवा जन्मदिन इसी अनाथालय में सभी बालिकाओं ने हैप्पी बर्थडे टू डिअर आंटी एक स्वर में गाकर मनाया था .
इस बार जब रोहन शिप से लौटा तो एक दिन अपनी मुहबोली बहनों से मिलने अनाथालय गया और उनसे उनकी जरूरत का सामान पूछा .ऐसा प्रतीत होता था कि वे सब पहले से तैयार बैठी थीं . उन सब लड़कियों ने अपनी सभी पाठ्य पुस्तकों की कुंजियों की लिस्ट रोहन के हाथ में थमा दी .रोहन बेचारा सारे दिन किताबों की दुकानों पर घूम घूम कर सारी कुंजियाँ एकत्र की और एक बहुत बड़े थैले में सारी किताबें भर कर अनाथालय पहुंचा . अनाथालय की लड़कियों की तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गयी हो ,उनकी आँखों में कृतज्ञता की चमक और ख़ुशी देख कर रोहन की सारी थकान गायब हो गयी . जैसे ही वो वापस जाने को हुआ एक छोटी सी बच्ची ने आवाज़ दी ,कहा ‘ भैय्या जरा रुकना ‘ और वो भाग कर अंदर गयी और उसने रोहन को एक रुमाल भेंट किया जिस पर कढ़ाई कर के लिखा हुआ था “ प्यारे भैय्या”
रोहन आज भी अपने जीवन की सबसे अमूल्य भेंट समझ कर उस रुमाल को संभाल कर रखे हुए है ,यही रुमाल उसे सदैव दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित करता रहता है.

मोहपाश

स्मृति और रीता  स्कूल से लौटते समय जब भी बड़े बंगले के सामने से गुजरते ,हमेशा एक कुत्ता उन की और देख कर ख़ुशी से पूंछ हिलाकर भौंकता था। ये दोनों भी उसके सर ,गर्दन पर प्यार से हाथ फेर कर उसके प्यार का उत्तर देती रहती थी। स्मृति और रीता का फ्लैट भी पास में ही था और यह रोज का रूटीन हो चूका था। वास्तव में स्मृति और रीता के घर पर भी कुछ दिन पहले तक एक  कुतिया शैरी हुआ करती थी परन्तु उसका अंत समय बहुत ही खराब बीता। वो अक्सर बीमार हो जाती। एक बार तो उसकी पिछली टांगों में लकवा मार गया ,इन दोनों बहनो ने बहुत सेवा की उसकी। रोज गोद में बिठाकर रिक्शे पर डॉक्टर वार्ष्णेय के पास ले जाना ,टांगों की तेल से मालिश करना आदि। दोनों की मेहनत रंग लाई। अब वो चलने फिरने लगी थी ,परन्तु उसका एनर्जी लेवल कम होता जा रहा था। अब तो हालत यह हो गयी थी की उसके मुंह से लार बहनी शुरू हो गयी थी। उसका कष्ट देखा नहीं जा रहा था। स्मृति  अपने पापा के साथ शैरी  को वेटेरनेरी हॉस्पिटल भी दिखाने ले गयी। वहां पर भी यही बताया गया की इसका अंत समय आ चुका है और यदि आप सबसे इसके कष्ट नहीं देखे जा रहे हैं तो इसकी मर्सी किलिंग करवाई जा सकती है। और फिर डॉक्टर की सलाह को मानते हुए वही करवाना पड़ा। जिस दिन शैरी की मर्सी किलिंग करवाई गयी ,पूरा परिवार रो रहा था और घर में खाना तक नहीं पका। सबसे ज्यादा रोने वालों में थे पापा।
 अब यह कुत्ता फिर से इन दोनों को मोहपाश में बाँध रहा था। इसका नाम था ' स्टेफी  '
एक दिन स्मृति और रीता अपनी बालकनी में बैठे हुए तेज बारिश का आनंद ले रही थीं की अचानक उन्हें पास से किसी कुत्ते के जोर जोर से रोने की आवाज़ आयी ,देखा तो स्टेफी रो रहा था ,गौर से देखा तो पता चला की उसके घर का दरवाज़ा बंद था और वो घनघोर बारिश में भीग रहा है.दोनों बहने तुरंत छाता ले कर स्टेफी के घर की तरफ भागी और घर की बहुत देर तक घंटी बजाने के उपरांत एक युवा औरत बाहर निकली और इनकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा . इनके यह पूछने पर कि कुत्ते को बाहर क्यों छोड़ा हुआ है तो उसने बताया कि वो बूढा हो गया है और घर में छोट बच्चे भी हैं इस लिए उसे बाहर छोड़ रखा है .इनके यह पूछने पर कि घर के बड़े बूढों के साथ भी आपके यहाँ यही व्यवहार होता है ,तो वो चुप रही .इन दोनों बहनों के यह धमकाने पर कि अगर स्टेफी आपने तुरंत अंदर नहीं किया तो मजबूर हो कर उन्हें PETA को शिकायत करनी पड़ेगी ,उस युवा औरत ने उस समय स्टेफी को घर के अंदर कर लिया. परन्तु पूरी बरसात में में स्टेफी के साथ यही व्यवहार होता रहा ,थक हारकर इन दोनों बहनों ने एक NGO पीपल फॉर एनिमल को फोन करके मदद मांगी .NGO वालों ने त्वरित एक्शन लेते हुए दो आदमी कुत्ते को लाने के लिए भेज दिए.स्टेफी को NGO वालों ने स्टेफी को काबू में करने की बहुत कोशिश की परन्तु वह इनके साथ जाने के लिए तैयार नहीं था,वह अब भी अपने उस मालिक का वफादार बना हुआ था जिसने उसे घर के बाहर लावारिस छोड़ दिया था.अंत में इन दोनों बहनों की मदद से उसे किसी तरह से एक बोरे में भर कर NGO ले जाया गया.
एक दिन इन दोनों बहनों को स्टेफी की याद आयी ,ये दोनों NGO में गयीं और स्टेफी को ढून्ढ कर उस से मिली .अब वो बहुत ही खुश नज़र आ रह था इन बहनों से कूद कूद कर गले मिल रहा था . इस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे रोमन दास अन्द्रोक्लेस और उस शेर जिसके पंजे से काँटा निकाला था उन दोनों का मिलन हो रहा हो . 

अप्रत्याशित

अप्रत्याशित
गांधी भवन में बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता थी एवं घर के तीनो बच्चे इसमें अपना हाथ आजमाना चाहते थे। रॉबिन बहुत असमंजस में था कि तीनो बच्चों को वो अपने स्कूटर पर कैसे बिठा कर ले जाएगा। उसकी बड़ी बेटी की पेंटिंग एवं ड्राइंग बहुत अच्छी थी और उसे इस प्रतियोगिता में कुछ न कुछ पुरुस्कार जीतने का विश्वास भी था। बेटे की  पेंटिंग एवं ड्राइंग भी ठीक ठाक ही थी। छोटी बेटी भी ज़िद कर रही थी कि वो भी इस प्रतियोगितामें अवश्य भाग लेगी। पांच साल की इस बच्ची  को न तो बड़े भाई बहन ले जाने मूड में थे और न ही रॉबिन। सबका कहना था कि ये वहां पर क्या करेगी? इसे न तो ड्राइंग आती है  और न ही इसके लिए स्कूटर में जगह। कुछ छोटी बेटी की जिद ,कुछ माँ की सिफारिश ने रोबिन को ऐसा को मजबूर कर दिया कि उसे भी साथ में ले जाना पड़ा। पूरे रास्ते डर डर के स्कूटर चला रहा था कि कहीं कोई ट्रैफिक का कोई सिपाही नज़र न आ जाये।  किसी तरह सब को लाद कर रॉबिन गांधी भवन  पहुंचा। वहां पर पेंटिंग प्रतियोगिता को विभिन्न आयु वर्गों में बाँट रखा था।  समय बहुत कम था। सभी को विषय बता कर पेंटिंग को एक घंटे में समाप्त करने को दिया गया। नियत समय पर प्रतियोगिता समाप्त करने की घोषणा कर दी गयी। तीनो बच्चे बहुत खुश थे और बड़ी बेटी तो पूरी आश्वस्त थी कि उसको तो कोई न कोई पुरुस्कार मिलेगा ही।
सायं पांच बजे प्रतियोगिता के विजेताओं की घोषणा होनी थी। सब को फिर से लाद कर रॉबिन सायं पांच बजे गांधी भवन पहुंचा।  वहां पर विभिन्न आयु वर्गों के विजेताओ की लिस्ट बोर्ड पर चिपकी हुई थी।  लिस्ट देखने पर बड़ी बेटी एवं बेटे को बहुत निराशा हुई ,उनका नाम लिस्ट में दूर दूर तक नहीं था। अब तो बच्चों के साथ साथ रॉबिन का मूड भी बहुत खराब हो गया था।  उसने सोचा था कि यदि बच्चों को कुछ सफलता मिलेगी तो सेलिब्रेट करने हेतु हज़रतगंज में सबको आइसक्रीम खिलायेगा। अब खाली हाथ वापस जा रहे थे, तभी छोटी बेटी ने कहा की मेरी लिस्ट भी देख लो। इस पर दोनों बड़े बच्चों ने उसका मजाक बनाया और कहा कि जब बड़े बड़े सूरमा भोपाली फेल हो चुके हैं तो उसकी क्या बिसात है ? छोटी बेटी का मन रखने के लिए ,कर्मचारियों से छोटे बच्चों की लिस्ट का स्थान पूछकर  बड़े बेमन से उसे देखने गए। लिस्ट देखकर तो सबकी आँखे फ़ैल गयीं , छोटी बेटी का नाम टॉप पर था।

रिस्ट वाच

समीर ने अपने जन्म दिन पर फरमाइश की कि मुझे एक रिस्ट वाच चाहिए।  उसके पापा उसे बहुत प्यार करते थे और बेटे को निराश नहीं करना चाहते थे। अपने सीमित साधनो में जिस प्रकार की घडी संभव हो सकती थी ,वो उसको ले दी। समीर घडी पाकर बहुत खुश था और अपनी कलाई को दोस्तों से छुपाता घूम रहा था ताकि दोस्त उस से कारण पूंछे और वो अपनी नयी घडी उन्हें दिखाए। समीर टेबल टेनिस का बहुत अच्छा खिलाडी था और अपने एज ग्रुप में वह स्टेट लेवल तक खेल चुका था।  इसी आधार पर उसका चयन 'नेहरू बाल संघ' के नेहरूजी के जन्मशती समारोह नई दिल्ली हेतु हो गया था. अब चूंकि पहली बार घर से निकल रहा था सभी को उसकी चिंता थी। दिल्ली में उसके मामा को उसके जाने की सूचना भी दे दी गयी थी. दिल्ली पहुँचने पर उसकी भारत के सभी प्रदेशों से आये हुए बच्चों से मुलाक़ात हुई और कइयों से तो उसकी घनिष्ठता भी हो गयी थी।  बहुत ही खुश था समीर। अपनी प्यारी घडी को वो साथ में ले जाना नहीं भूला ,और सभी नए दोस्तों को वह अपनी घडी जरूर दिखाता था। यह उन दिनों की बात है जब न तो मोबाइल फोन होते थे और न ही सब के पास कलाई घडी।
उसके पिता को जब तीन चार दिन तक उसकी कोई सूचना नहीं मिली तो उन्होंने अपने साले को पीसीओ से फोन लगाया और आग्रह किया कि जा कर समीर का कुशल क्षेम प्राप्त कर सूचना दे।  उसी दिन शाम को साले साहब का फोन आया और उन्होंने बताया समीर बहुत मजे में है खुश है लेकिन बहुत चिंता में भी है। पूछने पर उन्होंने बताया कि उसकी नयी घडी चोरी हो गयी है और वो बहुत टेंशन में था कि पापा जिन्होंने बड़े जतन से घडी लेकर दी थी वो क्या कहेंगे।
उसकी टेंशन की बात सुनकर उसके पापा भी  टेंशन में आ गए और सोचने लगे यह इतनी बड़ी बात तो नहीं है जिसके लिए पूरा ट्रिप खराब कर लिया जाए।

आज समीर दिल्ली से रेल से वापस आ रहा था और पापा उसे लेने प्लेटफार्म पर पहुंचे हुए थे।  ट्रेन से उतर कर पापा के गले लग गया।  अचानक उसने  नोटिस किया की पापा जो सदैव अपनी घडी पहन कर रखते थे वो उनकी कलाई पर नहीं थी। उसने पूछा पापा आपकी घडी कहाँ गयी ,पापा ने बताया कि  घडी पता नहीं कहाँ खो गयी है और तीन दिन से मिल नहीं रही है।  इतना सुनकर समीर बोला 'पापा मेरी भी घडी गुम हो गयी है , पता नहीं किसने कैंप में चुरा ली है ' अब वो टेंशन मुक्त था और सोच रहा था की जब पापा की घडी गुम हो सकती है तो मेरी क्यों नहीं। यह तो उसे बहुत बादमें पता चला की पापा ने उसे टेंशन मुक्त करने के लिए ही यह नाटक किया था.

यथार्थभासी

छोटी बेटी एक दिन स्कूल से घर पहुँचते ही बस्ता फेक कर जोर जोर से रोने लगी। बहुत पूछने पर बताया की स्कूल जाते समय रास्ते में एक बहुत खूबसूरत बंगला बन रहा है। मैं ,दीदी और उसकी सहेली रोज उस बंगले को देखते हैं। आज तो हद ही हो गयी जब दीदी और उसकी सहेली ने दो सुन्दर से दिखने वाले कमरों को पसंद कर के ये कहा कि ये दोनों कमरे तो हम दोनों रखेंगे और मुझे एक सडा सा कमरा दे दिया है। अब उस छोटे बच्चे को मैं कैसे समझाऊं की यथार्थ और यथार्थभासी में बहुत अंतर होता है।बेटी की निश्छल निष्कपट मासूमियत देख कर एक सुन्दर सी कविता याद आ गयी -
बच्चे
देखे गए सपनों से 
निकालते हैं नए सपने 
जैसे 
उसी कपड़े से निकालते हैं धागा 
फटे के रफू के लिए।
कागज़ की 
हवाई जहाज की फूँक उड़ान में 
उड़ते देखते हैं अपने स्वप्नों का जहाज।
रेत के घरौंदे में 
देखते हैं अपना पूरा घर।
वे 
खेल-खेल में 
खेलते हैं जीवन 
और 
हम सब 
जीवन में खेलते हैं खेल।

मीठे फल

नेहा का एडमिशन देश के विख्यात विश्वविद्यालय में हो गया था। पहली बार घर से दूर जा रही थी। उसके पास माता पिता के द्वारा दिए गए संस्कारों की पूँजी के अतिरिक्त बहुत कुछ नहीं था। उसके पिता एक बेहद ही ईमानदार,सत्यनिष्ठ ,अनुशासित अधिकारी थे एवं उन्होंने अपने बच्चों को भी यही संस्कार दिए थे। शुरू शुरू में तो कॉलेज में बहुत अच्छा लग रहा था। नया वातावरण , नए दोस्त ,सहेलियां, मेस के खाने का नया स्वाद। परन्तु कुछ दिनों के बाद घर की, घर के खाने की याद सताने लगी। वो माँ के हाथ के मूली के पराठे , वो राजमा चावल और यहाँ पतला पानी दाल , बेस्वाद सब्जियां ! एक दो बार मेस के खाने का विरोध किया ,तो सभी ने उसका साथ दिया क्योंकि आगे कोई नहीं आना चाहता था। सभी को लगा की नेहा को आगे किया जाय। सब ने मिल कर नेहा को मेस सेक्रेटरी चुन लिया। अब तो नेहा ने मेस के सभी कार्यकलापों में रूचि लेना प्रारम्भ कर दिया। धीरे धीरे मेस का खाना भी सुधरने लगा। नेहा ने मेस के सभी विभागों की निगरानी भी शुरू कर दी थी , इसका परिणाम यह हुआ की मेस की सब्जी फल आदि के सप्लायर भी परेशान रहने लगे। इन्ही सप्लायरों में एक प्रह्लाद नाम का सप्लायर भी था जिसका धंधा था मेस को सबस्टैंडर्ड फल सब्जी सप्लाई करना। मेस मैनेजर को खुश करके वो अपना धधा चला रहा था परन्तु नेहा की दखलंदाजी ने उसका धंधा मंदा कर दिया था। एक बार उसने मेस मैनेजर से पूछा की कौन है नयी मेस सेक्रटरी?उसके द्वारा यह बताने पर कि नेहा खरबंदा ही है जो मेस की सभी गतिविधयों पर निगाह रखे हुए है , बहुत खुश हो गया। कहने लगा " अब चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा "
एक दिन प्रह्लाद नाम पूछता हुआ हॉस्टल में आया और नेहा से बहुत गर्मजोशी से मिलते हुए उसने कहा कि नेहा से मिलकर बहुत ख़ुशी हुई। उसने कहा " बेटी तू भी पंजाबी है और मैं भी पंजाबी और तू तो अब मेरी बेटी है , चिंता मत कर , तेरी मेस में अब मैं बिलकुल फ्रेश फल सब्जी दिया करूंगा "
धीरे धीरे फल सब्जी आदि की गुणवत्ता में सुधार भी होने लगा। मेस में खाने वाले सभी विद्यार्थी भी खुश थे। 
एक दिन प्रह्लाद एक फल की टोकरी लिए हुए नेहा के कमरे पर पहुंचा और कहा बेटी ये रख ले ,अपनी सेहत का ख्याल रख। घर से दूर रहकर पढ़ाई के अलावा सेहत भी बहुत जरूरी है। और धीरे धीरे फलों की टोकरियाँ नेहा के कमरे पर ज्यादा और मेस में कम होती गयी। नेहा भी खुश थी की यहाँ पर भी उसका ख्याल रखने वाला एक चाचा मिल गया था। 
बड़े दिनों की छुट्टियों में नेहा घर आयी और पापा के पूछने पर कॉलेज की सारी गतिविधयों से अवगत कराया। फिर अचानक उसने पापा से पूछा कि क्या प्रह्लाद से फल लेना भी रिश्वत है। 
पापा ने कहा, 'हाँ बेटा प्रहलाद से फल लेना भी रिश्वत है, क्योंकि उसका मकसद तुम्हारी सेहत बनाना नहीं है, बल्कि मीठे फल खिला कर तुम्हारी आँखों में मीठी पट्टी बाँधना है, ताकि भविष्य में जब वह खराब, सड़ीगली सब्जियां मेस में भेजेगा तो या तो तुमको खराबी दिखाई नहीं देगी, या फिर तुम उसके खिलाए फलों के बोझ से इतना दब चुकी होगी, की कुछ कह ना सकोगी.
'
पर पापा अब मैं उनको मना कैसे करूं कि मुझे फल ना भेजा करें?' नेहा ने असमंजस भरे शब्दों में पूछा.पापा ने उसे बड़ी अच्छी बात बताई. उन्होंने कहा, 'बेटा ऐसे अवसरों पर एक बार बुरा बन जाने से अपना कुछ बिगड़ता नहीं पर दूसरों का भला अवश्य हो जाता है. मतलब प्रहलाद से एक बार कड़क शब्दों में कह दो, 'अंकल प्लीज आप मुझे फल भेजना बंद कर दो.' यदि वह कुछ और बहाना बनाए तो उसको कहना, 'यदि आप मेरी बात ना माने तो मुझे मजबूरन आपका फल सब्जी सप्प्लाई का ठेका बंद करना पडेगा.'
नेहा जब छुट्टियों के बाद कालेज पहुंची तो उसकी समझदारी पहले से ज्यादा बढ़ी हुई थी। इस बार जब प्रह्लाद फलों की टोकरी ले कर आया तो सहेलियों द्वारा रोकने एक बाद भी उसने फल लेने से इंकार कर दिया और कड़क शब्दों में उसे मना भी कर दिया। अब वो समझ चुकी थी की प्रह्लाद ने कैसे उसे बेवकूफ बनाने का प्रयास किया था। उसने सर्वप्रथम उसे बुलाकर ,अबतक जो फल दिए थे उसका पूरा मूल्य चुकाया। 
प्रह्लाद भी अब समझ चुका था की उसका पाला एक ईमानदार पिता की पुत्री से पड़ा है।

love यू बमीठा

गौरव एक बहुत ही संवेदन शील बच्चा था. वो हमेशा लोगों को अजीब अजीब से ऐसे नामों से पुकारता था जो की कभी पहले नहीं सुने होते थे।ऐसा प्रतीत होता था की किसी अन्य ग्रह की भाषा बोलता हो। इसी प्रकार वो अन्य जीव जंतुओं के भी नाम रख लिए थे। हमारे महल नुमा घर में बहुत सी तरह तरह की चिड़ियाँ भी आती रहती थी जिनमे से एक प्रकार की चिड़िया का नाम उसने 'बमीठा ' रख दिया था। एक बार खेलते खेलते उसने एक पेड़ पर बैठी हुई बमीठा चिड़िया को निशाना बना कर एक पत्थर फेका जो सीधे उसे लगा और चिड़िया सीधे जमीन पर गिर गयी,अब तो गौरव की हालत देखने योग्य थी। उसने पत्थर इस उद्देश्य से नहीं मारा था कि चिड़िया घायल हो जाय अथवा मर जाय ,मात्र बालसुलभ कौतुहल वश की गयी शैतानी मात्र थी परन्तु यही शैतानी बहुत भारी पढ़ गयी। उसने चिड़िया को उठाया ,मुह में रुई के फाहे से पानी डाला , फूक मारी परन्तु चिड़िया की आत्मा तो मुक्त हो चुकी थी। वो बेचारा आँखों में आंसू भरे हुए ,अपराध बोध से ग्रस्त , निस्तब्ध हो कर बैठ गया। उसकी बहनों ने उसे बहुत समझाने की चेष्टा की परन्तु वोह इस अपराध बोध बाहर नहीं आ पाया। उस चिड़िया को एक गड्ढे में गाड़ कर अंतिम संस्कार किया। इस घटना के बाद गौरव सभी जीव जंतुओं की सुरक्षा के प्रति और अधिक संवेदन शील हो गया था और मन ही मन संकल्प लिया की अब कभी भी किसी प्राणी को नहीं सताएगा।इन मूक प्राणियों हेतु लोगों को सचेत करने हेतु उसके मन में मंथन भी चल रहा था। 
अब गौरव बड़ा हो गया था परन्तु बचपन की वह घटना उसको अब भी कचोटती रहती थी। अब वह इंग्लैंड के एक नामचीन कॉलेज में MBA कर रहा था , अचानक एक दिन अपने एक सहपाठी को DSLR कैमरे से चिड़ियों की फोटो खींचते देखकर तुरंत उसके मस्तिष्क में बल्ब जला और तुरंत उसने भी एक कैमरा खरीदा और उस कैमरे के सारे फंक्शन्स के बारे में कुशलता प्राप्त की। अब उसका एक ही ध्येय हो गया था और लोगों को इन निरीह जीव जंतुओं को गन से शूट करने जगह कैमरे से शूट करने की सलाह देता था। अब उसका birding फोटोग्राफी में अंतराष्ट्रीय स्तर पर काफी नाम हो गया था.अब उसके birding फ़ोटोज़ की एक प्रदर्शनी भी लगने वाली है इस प्रदर्शनी को उसने नाम दिया "love यू बमीठा "

निश्छल अपराध बोध

जाड़े का मौसम दस्तक दे रहा था और आज अच्छी धूप निकली हुई थी। शशि ने सारे गरम कपड़ों को धूप दिखाने के लिए निकाल लिया और एक एक कपडा उल्टा कर धूप में डालने लगी। अपने पति का एक कोट जैसे ही उल्टा कर डालने लगी कोट की अंदर की जेब में कुछ होने का आभास हुआ , उसने हाथ डाला ,सौ सौ के दो नोट ! वो नोट उसने बच्चों को दिखाए और कहा पापा को मत बताना। शाम को श्याम ऑफिस से घर लौटा तो पाया की पत्नी कुछ बदली बदली सी लग रही है। कुछ मुस्कुराती हुई ,कुछ छुपाती हुई। उसने इस चीज़ को नोटिस तो किया परन्तु अपने में अधिक व्यस्त होने के कारण बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दी। रात को सोते समय भी कुछ इसी प्रकार के भाव पत्नी के चेहरे पर आते हुए देख श्याम से रहा न गया और उसने पूछ ही लिया। शशि मौन रही। श्याम जानता था कि उसकी पत्नी बहुत ही निश्छल किस्म की औरत थी ,इसलिए चुपचाप सो गया। रात को लगभग दो बजे श्याम को हलकी सी बिस्तर पर कुछ हलचल सी प्रतीत हुई तो उसने पाया की शशि अभी तक जाग रही थी। उसे बहुत आश्चर्य हुआ ,उसने पूछा 'क्या हुआ ', तो शशि ने कुछ सकुचाते हुए बताया कि आज सुबह आपके कोट से उसे दो सौ रूपये मिले हैं !श्याम नींद में नो कंमेंट वाली मुद्रा में था लेकिन यह सुनकर आँख खोल कर उसने अपनी पत्नी की ओर देखा तो पाया वो गहरी नींद में खर्राटे मार रही थी। अब वो अपराध बोध से मुक्त थी।