प्रतिकार
एक दिन कार्यालय से वापस घर आया तो पत्नी किसी
स्त्री से गपिया रही थी ,मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो बताया कि पड़ोस में नए
किरायेदार आये हैं उनकी पत्नी हैं.एक दिन वही पड़ोसन मेरी पत्नी के पास बैठी हुई रो
रही थी .उसके जाने के पश्चात् मैंने कारण पूछा ,तो पत्नी ने बताया कि इस का पति
रोज दारू पीकर इसको इसके बच्चों के सामने ही पीटता है. मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा “क्या
आप कुछ कर सकते हो ?“ मैंने पत्नी से कहा कि मैं सहानुभूति के अतिरिक्त और कुछ
नहीं कर सकता .और मैंने पत्नी से भी कहा कि किसी के व्यक्तिगत पचड़ों में पड़ने की
जरूरत नहीं है .पड़ोसन के समाचार पत्नी के द्वारा मिलते रहते थे ,उसकी स्थिति बद से
बत्तर होती जा रही थी .एक दिन तो हद ही हो गयी ,पड़ोसन अपने घर से जोर जोर से “बचाओ
बचाओ “ चीखती हुई भाग कर हमारे घर आ गयी और रो रो कर अपने पति से बचाने की गुहार
लगाने लगी . मैंने गौर से देखा तो उसका सर फटा हुआ था और झर झर खून बह रहा था .तुरंत
फर्स्ट ऐड बॉक्स निकाल कर उसकी पट्टी की और विचार करने लगा कि ऐसी स्थिति में क्या
किया जा सकता है?
मेरा मन अंदर से कचोट रहा था और अपने आप को कभी भी
इतना कमजोर नहीं अनुभव किया था .रोज टीवी पर सामाजिक सरोकार से सम्बन्धित प्रचार देखता
था .एक अधिवक्ता मित्र से सलाह ली ,उसने बताया कि फैमिली कोर्ट में एक मजिस्ट्रेट
उनकी जान पहचान की है ,उनसे मदद मांगी जा सकती है ,मैंने उनसे संपर्क किया और
उन्होंने तुरंत आवश्यक सहायता का आश्वासन दिया .इस बीच मैंने आस पड़ोस की सभी
महिलाओं को एकत्र कर के उनको पडोसी के घर पर ले गया और घायल पड़ोसन को भी वहीँ बुला
लिया .अब पडोसी बहुत ही लज्जाजनक स्थिति में नजर आने लगे .उनको , पडोसी महिलाओं ने
ऐसी ऐसी गालियों से नवाज़ा कि उनकी बहादुरी की सारी हवा निकल गयी.जब उनको बताया गया
कि एक मजिस्ट्रेट को भी बुला रखा है ताकि उनकी पीड़ित पत्नी के बयान रिकॉर्ड किये
जा सकें ,उनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी .अब तो पडोसी महराज माफी पे माफी मांगने
लगे .उनसे लिखित में माफीनामा लिखवाने एवं यह् सुनिश्चित करने के पश्चात कि अब वो
कभी भी इस प्रकार की जुर्रत नहीं कर सकेंगे , उनको छोड़ दिया गया.
अब पड़ोसन अक्सर हमारे घर मेरी पत्नी के पास आ जाया
करती थी और मुझे बहुत ही कृतज्ञता की दृष्टि से देखती .मुझसे अक्सर कहती कि भाई
साहब आप की वजह से ही हमारी गृहस्थी बच गयी है.एक दिन मैंने पड़ोसन से उसका नाम
पूछा ,उसने बताया “रमा”.नाम सुनकर तो मेरे मस्तिष्क में घंटियाँ बजने लगी और मैं
फ्लैशबैक में चला गया .
ये उन दिनों की बात है जब मैं पांचवी कक्षा में ,एक
सरकारी स्कूल में पढता था. हमारे एक आर्ट टीचर थे श्री अग्निहोत्री,बड़े ही जालिम
किस्म के व्यक्ति थे. होम वर्क ना कर पाने ,या ड्राइंग आदि ठीक से ना बन पाने पर
खड़े स्केल से हथेली पर इतनी जोर से मारते थे कि खून छलक जाये. अक्सर उनकी क्लास
मैं बंक कर जाया करता था .मेरी आर्ट बहुत ही कमजोर जो थी और उनकी क्लास की याद आते
ही पेट में मरोड़ शुरू हो जाते थे. हमारा स्कूल रेलवे स्टेशन के पास में ही स्थित
था इस लिए टाइम पास करने की कोई समस्या नहीं थी.स्टेशन के बाहर ही कई मजमे वाले
अपने मजमा लगा कर लोगो का मनोरंजन कर रहे होते .उन्ही मजमो की भीड़ में खड़ा हो जाता
.कोई शक्ति वर्धक तेल बेच रहा होता ,कोई बन्दर,भालू नचा रहा होता या कोई रस्सी को
तोड़ मरोड़ कर उसमे कलम फसा कर पैसे लूट रहा होता . बहुत मजा आता था .
पर बकरे की माँ कब तक खैर मनाती ?आर्ट की क्लास
इंटरवल के बाद पांचवे पीरियड में होती थी ,परन्तु एक दिन चौथे पीरियड के टीचर की
अनुपस्थिति में श्री अग्निहोत्री जी को क्लास लेने भेज दिया गया .उन्होंने मुझे
घूर कर इस प्रकार देखा जैसे शिकारी अपने शिकार को सामने पा कर देखता है .बहुत
दिनों के बाद मुलाक़ात हो रही थी .मैं अंदर ही अंदर आने वाली स्थिति को सोच सोच कर
पसीने पसीने हो रहा था .खड़ा कर दिया गया .पूछा “कहाँ थे अब तक ?”मैंने बताया कि
बुखार आ गया था .उन्होंने ऊपर से नीचे तक घूर के देखा ,उनके देखने के अंदाज से ही
बदन में झुरझुरी हो रही थी ,उन्होंने कहा बेटा ये बताओ कि मेरी ही क्लास में आने
के लिए तुम्हे बुखार चढ़ता है या किसी और की क्लास में भी ? मैं चुप ! “आओ बेटा !
ज़रा पास आओ “उन्होंने अपना स्केल निकाल लिया था .मेरी हालत ऐसी हो गयी थी कि बस
निकर में सुसु निकलने की कसर रह गयी थी . “हथेली खोलो !”उनकी आवाज़ गूँजी .मैंने
जैसे ही हथेली खोली ,एक खड़ा स्केल इतनी जोर से पडा कि दर्द के मारे इतनी जोर से
चीख निकली कि पूरे स्कूल में उसकी गूँज सुनाई दी .उस आवाज़ को सुन कर या ईश्वर ने
उन्हें कुछ सद्बुद्धि दी ,कुछ पता नहीं ,उन्होंने मुझे मारना बंद कर कहा कि मैं
तुम्हे नहीं मारूंगा यदि क्लास में एक भी विद्यार्थी यह कह दे कि तुम्हे ना मारा
जाये .मैंने पूरी क्लास को बड़ी कातर दृष्टि से देखा ,शायद कोई भगवान का बन्दा खडा
हो कर कह दे कि इसे मत मारो .पूरी क्लास में सन्नाटा छाया हुआ था कि अचानक एक लड़की
खड़ी हुई और बोली गुरूजी !इसे मत मारिये .और मैंने यह भी नोटिस किया कि वो लड़की भी
रो रही थी .मैं उस लड़की की मुझ जैसे नालायक के प्रति सहृदयता देख कर चकित एवं अभिभूत
था .
इस घटना ने मुझे बहुत अंदर तक झिंझोड़ दिया था .अब
मैं आर्ट की क्लास में प्रतिदिन आने लगा था ,और मेरी आर्ट भी पहले से काफी सुधर
गयी थी. मैं उस लड़की के रूप में एक छोटी
बहन को पाकर बहुत खुश था. सदैव क्लास में उसके पास ही बैठता .लेकिन यह ख़ुशी बहुत
दिनों तक नहीं रही. अचानक ,उसके पिता का अन्यत्र स्थानातरण होने के कारण उसको
स्कूल छोड़ के जाना पड़ा .उस सहृदय लड़की का नाम था “रमा”
उस रमा के छोटे से उपकार ने मेरे मन पर ऐसी छाप छोड़ी
कि मैं जीवन भर रमा को मन ही मन ढूँढता रहा और एक दबी सी इच्छा भी बनी हुई थी कि
काश मैं उसके इस उपकार का किसी भी प्रकार प्रतिकार कर पाता .
और आज! यह वही रमा थी .पच्चीस वर्षों के बाद ? मेरी
आँखों से आंसू रुक नहीं रहे थे, कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि “रमा” जीवन में
इस प्रकार मिलेगी और अनजाने में उसके उपकार का प्रतिकार मैं इस प्रकार करूंगा .
हे ईश्वर तेरी लीला निराली है !
-रवीन्द्र नाथ अरोड़ा