Tuesday, March 31, 2015

सोच

                 
श्याम किसी मित्र को रेलवे स्टेशन छोड़ कर वापस आ रहा था तभी उसे रास्ते में याद आया की उनके अभिन्न मित्र श्री मेहता साहब का घर भी कहीं आस पास ही है ,उसने सोचा चलो बहुत दिन हो गए हैं ,आज उनसे भी मिल लिया जाय .श्री मेहता को श्याम अंकल कह कर ही पुकारता था क्यों कि श्री मेहता उसके अभिन्न मित्र अनिल के ससुर थे .श्री मेहता इतने व्यवहार कुशल एवं इतने स्नेही थे कि देहरादून से लखनऊ आने पर श्याम को ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे उसके स्वयं के पिता उसे मिल गए हों .जब भी श्याम उनकी दूकान पर जाता तो कभी मौसमी का जूस या गन्ने का रस पिलवाये बिना आने ही नहीं देते थे.मेहता साहब भगवान् शंकर के अनन्य भक्त थे ,हर सोमवार को व्रत रखते और उनके लिए शिवरात्रि वर्ष का सबसे बड़ा पर्व होता था .
आज श्याम पहली बार उनके घर जा रहा था .जैसे ही श्याम ने मेहता साहब के घर पर घटी बजाई ,उनकी पोती ने दरवाजा खोल कर नाम पूछा ,और जैसे ही मेहता साहब ने श्याम का नाम सुना ,लपक कर आये और बहुत गर्मजोशी से गले मिले .इतने खुश ,गदगद हुए ,उनकी प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं थी. सभी बेटों,बहुओं,पोते एवं पोतियों से श्याम का परिचय करवाया और फिर अपनी बड़ी बहु को आवाज़ दे कर आदेश दिया की आज श्याम बेटा घर पर पहली बार आया है आज मटन बिरयानी ,चिकन बनाओ और बेटे को कहा अन्दर अलमारी से स्काच की बोतल निकाल कर लाओ ,आज श्याम के साथ बैठ कर पी जायगी .श्याम यह सब देख कर थोडा असहज हो रहा था .मन ही मन सोच रहा था कहाँ फस गया ?परन्तु मेहता साहब को आदरवश कुछ कहने का साहस भी नहीं कर पा रहा था.लगभग दो घंटे तक श्याम ने मेहता साहब की मेहमाननवाजी का लुत्फ़ उठाया .आज मेहता साहब बहुत प्रसन्न थे .जब श्याम चलने को हुआ तो मेहता साहब ने पूछा “आप किधर से जाओगे ?” श्याम ने प्रत्युत्तर में पुछा “क्यों ,बताईये ?”इस पर मेहता साहब ने कहा ,जरा मुझे मंदिर तक छोड़ देना ,भगवान् के दर्शन करने हैं .श्याम को काटो तो खून नहीं .उसने मेहता साहब से पूछा “मांस ,मदिरा के सेवन के उपरान्त मंदिर ?”
उन्होंने श्याम को घूर कर देखा और जो उत्तर दिया वह आज भी श्याम के मस्तिष्क पटल पर अंकित है ‘उनका उत्तर था “श्याम! जब ईश्वर रोज सूखी दाल रोटी खिला रहा था तो हम उनका आभार प्रकट कर रहे थे ,और आज जब उन्होंने तुम्हे हमसे मिलवाया ,इतना अच्छा भोजन करवाया और स्काच भी पिलवायी ,तो क्या आज हम ईश्वर का आभार नहीं प्रकट करेगे ?आज तो विशेष आभार प्रकट करेगे “

एक ही पल में उनके उत्तर ने श्याम की धर्म,पूजा पाठ ,कर्म कांड ,पवित्रता सम्बन्धी सारी पोंगापंथी वर्जनाएं तोड़ कर रख दी .

‘ लियो’

                          ‘ लियो’

एक विडिओ देख रहा था ,जिसमे कुत्ते अपने मालिकों को अपने विभिन्न करतबों से जगा रहे थे.इस पर मुझे भी याद आया कि हमारे पास भी एक जर्मन स्पिट्ज कुत्ता था जिसका नाम हमने लियो रखा था .बहुत ही संवेदन शील था वो.ऑफिस से लौटते समय जब मेरा स्कूटर घर से लगभग एक किलोमीटर होता था तो उसे मेरे आने का आभास हो जाता था और जब मैं घर पहुंचता तो वो जोर जोर से पूंछ हिलाकर,मुझसे उछल उछल कर लिपट कर अपना प्यार जताता .जब कभी भी घर के सभी सदस्यों को उसे छोड़ कर जाना होता तो वह बहुत रोता और वापस आने पर बहुत नाराज़ होता. फिर उसको मनाने का हमारे पास एक ही तरीका होता ,उसके प्रिय व्यंजन आमलेट और पापड़ ,वही उसे दिए जाते तब वह मानता. वो कभी कभी तो बच्चों के साथ स्कूल की क्लास में भी चला जाता .उस से जुडी हुई जीवन की अनेक घटनाएं /अनुभव हैं जिन्हें हम आज भी याद करते हैं.उस से जुडी हुई एक घटना याद आ रही है कि मेरी पत्नी को स्नोफिलिया हो गया था और उसे सांस लेने में बहुत समस्या हो रही थी .बेचारी रात रात भर जगती रहती . कई डाक्टरों को दिखाया ,बहुत फर्क नहीं पड़ रहा था .मेरी नींद में कोई बाधा ना पड़े इस लिए वो कभी कभी दुसरे बेडरूम में सोने चली जाती थी .एक रात की बात है कि लियो अचानक रात को मेरी चादर खीच कर मुझे जगाने का प्रयास कर रहा था और जब तक उसने मुझे जगा नहीं लिया तब तक उसने दम नहीं लिया .मैं जब उठ कर बैठ गया तो वो भौंक भौंक कर दूसरे कमरे की ओर इशारा कर रहा था . इस बीच मैंने देखा की पत्नी अपने बेड पर नहीं है तो मैं दूसरे कमरे की ओर भागा और देखा की पत्नी को सांस नहीं आ रही है और वो रोये जा रही थी .तुरंत किसी प्रकार पत्नी को रात को ही होस्पिटलाइज़ किया और किसी प्रकार उसकी जान बचाई .आज मैं सोचता हूँ कि शायद उस दिन लियो ने मुझे जगाया ना होता ना जाने क्या अनर्थ हो जाता .इस बारे में मैं एक ही बात कह सकता हूँ .

“वो यहाँ पर हमारी जिंदगी का शायद एक हिस्सा था ,लेकिन हम तो उसकी पूरी जिंदगी ही थे “(He might only be here for a part of our life but for him we were his whole life)

रवीन्द्र नाथ अरोड़ा 

Tuesday, February 24, 2015

पार्किन्सन

                        पार्किन्सन

आदेश जी का पार्किन्सन काफी बढ़ गया था और उनकी पत्नी को अब उन्हें सम्भालने में बहुत परेशानी हो रही थी.वो बेचारी प्रतिदिन उनको जबरदस्ती ठेलती हुई घुमाने ले जाया करती थी . आदेश जी के शरीर में स्टिफनेस बढती जा रही थी . आदेश जी का खाना खाने की भी बहुत इच्छा नहीं करती थी .इस बीमारी की सबसे बड़ी समस्या तो ब्रेन की ही होती है और धीरे धीरे ब्रेन और शरीर का सामन्जस्य भी शिथिल होने लगता है .कभी कभी तोउनकी पत्नी उनको ,जब घूमने या खाना खाने के लिए बोलती तो वो लड़ना शुरू कर देते थे .डॉक्टरों के पास ले जाना ,उनको एक्सरसाइज कराना ,खाना खिलाना ही उनकी पत्नी की पूर्णकालिक दिनचर्या बन गयी थी .उनकी पत्नी बहुत ही कर्मठ किस्म की नारी थी . सदैव मुस्कुराती रहती ,कभी अपने पति एवं अपने कष्टों को कभी भी दूसरों से शेयर नहीं करती थी .
आदेश जी के दो पुत्र थे और दोनों ही विवाहित थे एवं विदेशों में अच्छी जॉब पर लगे हुए थे और उनका एक पुत्र एवं पुत्र वधु दोनों ही डॉक्टर थे . दोनों बेटों को अपने माता पिता से बहुत स्नेह था . आदेश जी की पत्नी कभी भी अपने बच्चों को आदेश जी की बीमारी के बारे में बहुत ज्यादा नहीं बताती थी ,सोचती थी ,की दूर बैठे हुए हैं ,क्यों उनको कष्ट दिया जाए .एक दिन तो आदेश जी की यह हालत हो गयी कि चलते चलते रास्ते में एक दम से रुक गए और वहीँ पर पत्नी के सम्भालते सम्भालते गिर गए .किसी प्रकार एक कार वाले को रोक कर ,उसमे किसी प्रकार बैठा कर घर लाया गया .मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों से कंसल्ट किया गया ,उन्होंने सारे टेस्ट करने के बाद दवाइयां लिख दी .
इस बीच आदेश जी जिस अपार्टमेंट में रहते थे ,उसकी सोसाइटी के सेक्रेटरी से उनका हाल देखा नहीं गया और उसने उनके डॉक्टर बेटे को आदेश जी की गंभीर स्थिति के बारे में सूचित कर दिया .बेटा बेचारा यह सब सुन कर बहुत परेशान हो गया और तुरंत माँ से बात की और खूब लड़ा .फिर उसने अपनी डॉक्टर पत्नी से पिता की गंभीर स्थिति की चर्चा की तो उसकी पत्नी ने तुरंत अपने पति से कहा कि हमारे माँ बाप ने यही दिन देखने के लिए क्या हम लोगों को पढ़ा लिखा कर बड़ा किया था ,हमें तुरंत कुछ करना चाहिए .उसने अपने पति से कहा हम लोग विदेशों में डाक्टरी कर रहे है और हमारे माता पिता घर में कष्ट में हों ,यह कोई अच्छी बात तो नहीं है .पत्नी ने तुरंत अपने हॉस्पिटल से छुट्टी ली ,दिल्ली का टिकेट कटाया ,और दिल्ली आकर एक एयर एम्बुलेंस का प्रबंध किया और अपने सास ससुर को तैयार रहने के लिए बोल दिया . एयर एम्बुलेंस का हेलीकाप्टर जैसे ही अपार्टमेंट की छत पर उतरा ,सब लोग हैरान !जैसे ही पता चला सारे अपार्टमेंट वासी इकट्ठे हो गए .उनकी बहू ने विशेष रूप से सोसाइटी के सेक्रेटरी को सूचना देने के लिए आभार प्रकट किया .यह पूछने पर कि आदेश जी का बेटा क्यों नहीं आया ,तो बहू ने बताया वो पापा का हाल सुन कर रोने लगे ,उनकी हालत देख कर ही मैंने स्वयं आने का निर्णय लिया .यह पूछने पर कि अब क्या होगा ,तो बहू ने बताया कि  विदेश में जिस शहर में वो लोग रहते हैं वहां के बेस्ट न्यूरोलॉजिस्ट से अपॉइंटमेंट ले लिया गया है और वहां पहुँचते ही इलाज शुरू हो जाएगा .इलाज के खर्च के बारे में पूछने पर उसने कहा कि जितने भी पैसे खर्च हो जाएँ इसकी कोई परवाह नहीं .पैसा क्या माता पिता से बढ़ कर होता है .
एयर एम्बुलेंस का हेलीकाप्टर आदेश जी ,उनकी पत्नी  व बहू को लेकर जैसे ही उड़ने को हुआ ,सभी अपार्टमेंट वासियों ने शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामनाएं देते हुए उन्हें बिदा किया .उस समय सब के होठों पर एक ही बात थी “ऐसे बेटा बहू सब को दे “
इस बार जब होली के उत्सव पर सभी अपार्टमेंट वासी एकत्र हुए तो सोसाइटी के सेक्रेटरी ने सबको अवगत कराया कि विदेश में आदेश जी के ब्रेन की अत्याधुनिक विधि से सर्जरी करके एक स्टेंट लगा दिया गया है जिससे कि उनका पार्किन्सन लगभग ठीक हो गया है .उन्होंने यह भी बताया की आदेश जी अपने बेटे बहू नाती पोतों के साथ बहुत खुश हैं . सोसाइटी के सेक्रेटरी ने इस मौके पर बेटे पर लिखी निम्न चार पंक्तियाँ भी सुनाई-
 पिता के कंधो पर बैठ कर दुनिया को समझती जिज्ञासा है बेटे,
 तो कभी बूढ़े पिता को दवा, सहारा, सेवा सुश्रुषा है बेटे,
 पिता का अथाह विश्वास और परिवार का अभिमान है बेटे,
 भले कितने ही शैतान हो पर घर की पहचान है बेटे.” 

Monday, February 23, 2015

ऐसा भी होता है !

                      ऐसा भी होता है !

जिसने भी सुना वो दंग रह गया.श्री मोहन के साथ ऐसा हो गया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी . श्री मोहन एक बैंक में अधिकारी थे और एक ऋण विशेषीकृत शाखा के शाखा प्रबंधक भी थे .उनके  ऊपर क्षेत्रीय प्रबंधक की भी विशेष कृपा थी .हो भी क्यों ना ,आखिर दूध देने वाली गाय थी .श्री मोहन की सेटिंग क्षेत्रीय प्रबंधक के साथ बहुत बढ़िया थी ,उनकी शाखा को ऋण बजट के टारगेट भी जरूरत से ज्यादा दिए गए थे ताकि अधिक से अधिक ऋण हों और प्रबंधक तथा क्षेत्रीय प्रबंधक की आमदनी भी .यह वह समय था जब एक ट्रक ऋण पर लगभग रु १००००/-की अतिरिक्त आमदनी शाखा प्रबंधक कर सकता था .यही १००००/- क्षेत्रीय प्रबंधक एवं शाखा प्रबंधक के बीच में बटा करते थे .श्री मोहन की शाखा से धड़ाधड़  ट्रक लोन हो रहे थे और पूरे शहर में यह चर्चा आम थी कि चाहे जैसा भी  ट्रक लोन करवाना हो तो श्री मोहन की शाखा से करवाया जा सकता है . श्री मोहन,पैसा कमाने के चक्कर में,परिवार का ,अपने स्वास्थ्य आदि का भी कोई होश नहीं रहा था .इसी दौरान उनकी पत्नी ने नोटिस किया की उनकी भूख कुछ कम हो गयी है .पहले श्री मोहन चार रोटी खाते थे अब वो दूसरी रोटी पर भी ना नुकुर करने लगे थे .टोकने पर बोले की तुम्हे वहम हो गया है ,आजकल काम की चिंता ज्यादा है ,इसलिए भूख थोडा कम लग रही है .एक दिन जब श्री मोहन की पत्नी उनके अन्तः वस्त्र धो रही थी तो देखा कि उनके अंडरवियर और बनियान बिलकुल पीले हो गए थे .यह तो चिंता का विषय था ,उनको पीलिया (Jaundice) हो गया था .श्री मोहन को जब बताया तो उनका जवाब था “ ये कोई लाइलाज बीमारी तो है नहीं ,इसका इलाज हो जाएगा ,ज्यादा चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है .”उनकी सोच में यह था कि पैसे से सब कुछ हो सकता है यदि आदमी के पास पैसा हो तो सब कुछ संभव है .पैसे से ही आदमी की इज्जत है और आने वाली पीढियां भी खुशहाल रहती हैं .अभी तो वक्त है पैसा कमाने का .पहले खूब पैसा कमा लिया जाए बाद में सब देखा जयेगा.
  एक दिन लगभग दोपहर के १२ बजे ,बैंक का चपरासी घर में भागा भागा आया ,और बताया की साहब ऑफिस में बेहोश होकर गिर गए हैं .पत्नी बेचारी जवान बेटे को साथ लेकर ऑफिस पहुंची और एम्बुलेंस बुलाकर उनको शहर के सबसे बड़े हॉस्पिटल में दाखिल करवा दिया गया .डॉक्टरों की टीम ने उनका निरीक्षण करने के बाद बताया कि इनका jaundice लास्ट स्टेज पर आ गया है अर्थात उनको लीवर सिरोसिस हो गया था ,इनके लीवर ने बिलकुल काम करना बंद कर दिया है ,इनको तुरंत दिल्ली ले जाइये .एक टैक्सी में तुरंत उनको दिल्ली ले जाया गया और वहां के नामी हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया गया जहां पर . सभी रिश्तेदार,बेटियां ,दामाद आदि यहाँ हॉस्पिटल में पहुँच चुके थे . यहाँ पर भी उनकी हालत में बहुत सुधार नहीं हुआ और तीन दिनों के उपरान्त उनका निधन हो गया .सभी बिलों का भुगतान करने के पश्चात उनकी देह को मार्चुरी से लाकर हॉस्पिटल के  प्रांगण में रख दिया गया .उनकी पत्नी प्रतीक्षा कर रही थी कि कब शव वाहन को लाया जाय और उनकी देह को अंतिम संस्कार हेतु अपने शहर ले जाया जाय .देर होते देख वो हॉस्पिटल के गेट तक आयी तो देखा हॉस्पिटल के लॉन में भीड़ लगी हुई है और भीड़ के अंदर घुस कर जो उसने देखा तो उसके होश उड़ गए .उसके बेटे ,दामादों और बेटियों में स्वर्गीय मोहन जी की जायदाद के बटवारे को लेकर गुत्थमगुत्था हो रही थी .यह देखकर तो वो बेहोश होते बची .वह अपनी सारी उर्जा को एकत्रित करके जोर से चीखी “हराम जादो ,वो तुम्हारे लिए ही पैसे कमा रहा था,कम से कम उसके अंतिम संस्कार तक तो रुक जाते “ यह सुन कर उनके बेटे ने गुस्से से अपनी माँ को देखा और एक टैक्सी बुलाकर उसकी डिक्की में श्री मोहन की बॉडी को ठूसा और माँ को खींच कर उसमे बिठाकर ,अपने शहर रवाना हो गए .रास्ते भर माँ रोते रोते यही सोचती रही कि उनके पति ने आखिर क्या कमाई की ?क्या इन्ही बच्चों की ख़ुशी के लिए ही उसके पति यह सब कर रहे थे ?टैक्सी के आगे आगे एक ट्रक जा रहा था और उसके पीछे लिखा था -

“कैद कर दिया सापों को ये कहकर सपेरे ने.
 बस अब इन्सानों को डसने के लिये उसके अपने ही काफी है” 

Wednesday, February 18, 2015

वसीयत

                                          वसीयत 

चीफ इंजिनियर मिश्र को PWD से रिटायर हुए दस वर्ष हो चुके थे.नयी दिल्ली के पोश एरिया के एक  अपार्टमेंट में उनका एक तीन बेडरूम का आलीशान फ्लैट था .उनकी पत्नी का लगभग पांच वर्ष पूर्व देहांत हो चुका था.बेटी और दामाद लन्दन में सेटल्ड थे और विवाहित बेटा यू एस की एक मल्टी नेशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर लगा हुआ था .जब पत्नी जीवित थी तो वे अक्सर बच्चों के पास जब भी जाया करते थे तो दोस्त यार पूछा करते थे क्या IAS ज्वाइन कर ली है ,वो समझ नहीं पाते थे कि इसका क्या मतलब है .फिर दोस्त हसकर बताते कि इसका मतलब है ‘इंडियन आया सर्विसेज’.विदेश में बच्चों को माता पिता की याद तभी आती है जब उनके यहाँ बच्चा होने वाला होता है तब उन्हें एक आया की जरूरत पड़ती है. मिश्रजी इस पर मुस्करा भर देते थे .
अब वो निपट अकेले थे ,बच्चों के यदाकदा फ़ोन आ जाया करते थे पर इतने से अकेलापन तो नहीं कट सकता .पार्क की बेंच पर अक्सर अकेले बैठे दीखते थे ,कभी कभी तो लोगों ने उनको रोते हुए भी देखा था .किस से क्या बात करे ?महानगरीय संस्कृति में किसी को किसी से बात करने का कोई समय नहीं है .अब वो अक्सर बीमार रहने लगे थे और एक दिन उनके फ्लैट से बदबू आते देख कर सोसाइटी के पदाधिकारियों की उपस्थिति में फ्लैट का दरवाजा तोडा गया तो देखा कि मिश्रजी की आत्मा तो चार दिन पहले ही शरीर से मुक्त हो चुकी है .तुरन्त उनके बच्चों को विदेश में फ़ोन करके वस्तुस्तिथि से अवगत कराया गया .बेटे ने फ़ोन पर बताया वो अभी पिता के क्रियाकर्म के लिए नहीं आ सकता ,बेटी से बात करने पर उसने भी यही कहा कि अभी वो बहुत व्यस्त है और आने में असमर्थ है .उन दोनों बच्चों ने सोसाइटी अध्यक्ष से यह भी निवेदन किया की पिता के पार्थिव शरीर को किसी मार्चुरी के फ्रीजर में रखवा दे जब भी उन्हें समय मिलेगा वो आकर स्वर्गीय पिता का दाह संस्कार कर देंगे .  मिश्रजी का शरीर इतना क्षतिग्रस्त हो चुका था कि उसका सोसाइटी के द्वारा तुरंत दाहसंस्कार करना पडा .
मिश्रजी के देहांत के लगभग पंद्रह दिनों के पश्चात उनके पुत्र व पुत्री दोनों आ गए और और दाह संस्कार के बारे में सुनकर बेटा तो तुरन्त तैश में आ गया और सोसाइटी अध्यक्ष को पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने की धमकी देने लगा . सोसाइटी अध्यक्ष बेटे का अनर्गल प्रलाप सुनकर क्रोध में आ गए और उन्होंने कहा “उल्लू के पट्ठे ! तुम कमीनों को जब इत्तला की तो तुम्हारे पास बाप का किरिया करम करने का टाइम नहीं था और उनका शरीर इतना सड़ चुका था कि सोसाइटी को उसका किरिया करम करना पड़ा .बजाय इसके कि तुम सोसाइटी का एहसान मानो ,हमें गाली दे रहे हो ?तुम्हारा बाप यहीं पार्क की बेंच पर बैठा बैठा रोया करता था और आजतक तुम लोगों ने उसकी कभी खबर नहीं ली और आज तुम हमें गाली दे रहे हो .जाओ जहाँ भी रिपोर्ट लिखवानी है लिखवा दो हमें कोई परवाह नहीं है “
यह सुन कर जब दोनों जाने के लिए मुड़े तो सोसाइटी अध्यक्ष ने उन्हें बुलाकर कहा “जा रहे हो?जाते जाते अपने बाप की वसीयत जो सोसाइटी के पास छोड़ गया है वो तो सुनते जाओ! “ यह सुन कर दोनों की आँखों में थोड़ी चमक आ गयी और वसीयत सुनने के लिए रुक गए .सबके सामने सोसाइटी अध्यक्ष ने वसीयत को खोला और पढना शुरू किया “ मेरे दोनों बच्चों को मेरी जायदाद से एक धेला भी ना दिया जाये ,मेरा फ्लैट एवं जितनी जमा पूँजी है वो मैं सोसाइटी के नाम कर के जा रहा हूँ “ 

अन्धविश्वास

                               अन्धविश्वास


बच्चों के एडमिशन के लिए विभिन्न स्कूलों के फार्म निकल रहे थे ,मुझे भी अपनी छोटी बेटी का एडमिशन किसी अच्छे स्कूल में करवाना था परन्तु समझ में नहीं आ रहा था कहाँ करवाएं .एक दिन  मेरे एक अधीनस्थ क्लर्क ने मुझे बताया कि सर ! सैंट गोबैन जो कि शहर के प्रतिष्ठित स्कूलों में से एक था ,के फार्म निकले हैं और मैं उसे लेने जा रहा हूँ .मैंने कहा कि मुझे भी एक फार्म चाहिए ,तो उसने कहा कि आप को स्वयं ही चलना पड़ेगा .अतः हम दोनों एक ही स्कूटर पर बैठ कर निकल पड़े .थोड़ी ही दूर चले होंगे कि एक काली बिल्ली हमारा रास्ता काट गयी .यह देख कर मेरा क्लर्क तो सहम गया और बोला ,सर आज काम नहीं बनेगा .मैंने उस से कहा की आजकल के वैज्ञानिक युग में भी तुम इन बातों पर विश्वास करते हो ? खैर , किसी तरह स्कूल पहुचे और देखा कि फार्म लेने वालों की बहुत लम्बी लाइन लगी हुई है .हम भी लाइन में लग गए और मेरा क्लर्क मेरे पीछे खड़ा हो गया.लगभग आधे घंटे में हमारा भी नंबर आ गया और बेटी का नाम लिख कर स्कूल क्लर्क ने एक फार्म मुझे इशू कर दिया और इसके उपरांत स्कूल क्लर्क ने फार्म समाप्त होने की घोषणा भी कर दी .मेरा क्लर्क बेचारा हतप्रभ ! मैंने स्कूल क्लर्क से बहुत रिक्वेस्ट की कि प्लीज एक फार्म और दे दे परन्तु स्कूल क्लर्क ने बताया की फार्म वास्तव में समाप्त हो गए हैं और वो कुछ नहीं कर सकता.यह मात्र एक संयोग था जिसने कि मेरे क्लर्क के बिल्ली द्वारा रास्ता काटने के अन्धविश्वास को सच कर दिया जबकि बिल्ली ने रास्ता मेरा भी काटा था. 

Monday, February 16, 2015

तपस्या


                                    तपस्या

“अब आप इस बच्चे का क्या करोगे ?” तमिलनाडु एक्सप्रेस में वीर के साथ बैठे हुए पैसेंजर ने पूछा .वीर जो कि अपने बेटे को जिसकी कि एक आँख में गहरी चोट लग गयी थी , को मद्रास के शंकर नेत्रालय में बेटे की आँख बचाने की आखिरी कोशिश करने आया था और नेत्रालय द्वारा जवाब देने के उपरांत ,कुछ निराश सा वापस लौट रहा था .अचानक तन्द्रा से जागा वीर और उसने उत्तर दिया “मैं इस बच्चे को इतना काबिल बना दूंगा कि दुनिया इसकी आँख की तरफ देखेगी भी नहीं”.
उसके बाद वीर का पूरा जीवन ही बदल गया . वो रात को मुश्किल से दो घंटे ही सो पाता था बाकी समय उसने कंप्यूटर की हर प्रकार की प्रोग्रामिंग को सीखने में लगा दिया .इस काम में उसकी निम्न आर्थिक स्थिति भी आड़े ना आ सकी .यह वह समय था जब भारत में कंप्यूटर नया नया आया था और बहुत ही कम लोग इसके बारे में जानते थे .उसने अपने प्रोविडेंट फण्ड एवं अन्य स्त्रोतों से ऋण ले कर एक कंप्यूटर खरीदा . सम्बंधित पुस्तके भी कम मंहगी ना थीं ,परन्तु उसने हिम्मत ना हारी .भारत में कोई भी कंप्यूटर सम्बन्धी पुस्तक प्रकाशित होती ,उसे वो खरीदता जरूर था .वीर जितना भी ज्ञान प्राप्त करता उसे अपने बेटे से शेयर करता और उसे भी धीरे धीरे इस विधा में निपुण बनाने का प्रयास करता .बेटा भी पिता का मंतव्य समझ कर पूरी लगन से अपनी स्कूल की पढाई के साथ साथ कंप्यूटर ज्ञान प्राप्त करने में लग गया .
इस बात को लगभग पांच वर्ष बीत गए थे ,बेटा भी अब  अपने पिता की भांति कंप्यूटर की हर प्रकार की प्रोग्रामिंग में निपुण हो चुका था एवं आज किसी बड़ी आई टी कंपनी में उसका इंटरव्यू था .उसकी निपुणता से प्रभावित हो कर कंपनी वालों उसे अच्छी सैलरी पर उसे अच्छे पद पर रख लिया . आज वीर अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रहा था .उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था .उसने यह बात अपने मित्र रोबिन से शेयर की तो रोबिन ने प्रत्युत्तर में कहा “वीर आज तुम्हारी बरसों की तपस्या सफल हो गयी “. यह सुन कर वीर की आँखों में आंसू आ गए और बोला “मेरे कान इस बात को सुनने के लिए तरस रहे थे “
दस वर्षों के बाद  वीर का फ़ोन रोबिन को आया था ,बहुत ही खुश था वो .उसका बेटा जो कि वर्तमान में किसी विदेशी कंपनी में २६ लाख वार्षिक के पैकेज पर लगा हुआ था ,उसे यू एस की एक कंपनी ने एक लाख सत्रह हजार डॉलर वार्षिक का ऑफर दिया है जिसे कि उसने स्वीकार कर , जाने की तैय्यारी शुरू कर दी है.रोबिन को उसकी ख़ुशी भरी आवाज़ के पीछे इस उम्र में अपना वतन छोड़ने का दर्द भी महसूस हो रहा था