Tuesday, March 31, 2015

सोच

                 
श्याम किसी मित्र को रेलवे स्टेशन छोड़ कर वापस आ रहा था तभी उसे रास्ते में याद आया की उनके अभिन्न मित्र श्री मेहता साहब का घर भी कहीं आस पास ही है ,उसने सोचा चलो बहुत दिन हो गए हैं ,आज उनसे भी मिल लिया जाय .श्री मेहता को श्याम अंकल कह कर ही पुकारता था क्यों कि श्री मेहता उसके अभिन्न मित्र अनिल के ससुर थे .श्री मेहता इतने व्यवहार कुशल एवं इतने स्नेही थे कि देहरादून से लखनऊ आने पर श्याम को ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे उसके स्वयं के पिता उसे मिल गए हों .जब भी श्याम उनकी दूकान पर जाता तो कभी मौसमी का जूस या गन्ने का रस पिलवाये बिना आने ही नहीं देते थे.मेहता साहब भगवान् शंकर के अनन्य भक्त थे ,हर सोमवार को व्रत रखते और उनके लिए शिवरात्रि वर्ष का सबसे बड़ा पर्व होता था .
आज श्याम पहली बार उनके घर जा रहा था .जैसे ही श्याम ने मेहता साहब के घर पर घटी बजाई ,उनकी पोती ने दरवाजा खोल कर नाम पूछा ,और जैसे ही मेहता साहब ने श्याम का नाम सुना ,लपक कर आये और बहुत गर्मजोशी से गले मिले .इतने खुश ,गदगद हुए ,उनकी प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं थी. सभी बेटों,बहुओं,पोते एवं पोतियों से श्याम का परिचय करवाया और फिर अपनी बड़ी बहु को आवाज़ दे कर आदेश दिया की आज श्याम बेटा घर पर पहली बार आया है आज मटन बिरयानी ,चिकन बनाओ और बेटे को कहा अन्दर अलमारी से स्काच की बोतल निकाल कर लाओ ,आज श्याम के साथ बैठ कर पी जायगी .श्याम यह सब देख कर थोडा असहज हो रहा था .मन ही मन सोच रहा था कहाँ फस गया ?परन्तु मेहता साहब को आदरवश कुछ कहने का साहस भी नहीं कर पा रहा था.लगभग दो घंटे तक श्याम ने मेहता साहब की मेहमाननवाजी का लुत्फ़ उठाया .आज मेहता साहब बहुत प्रसन्न थे .जब श्याम चलने को हुआ तो मेहता साहब ने पूछा “आप किधर से जाओगे ?” श्याम ने प्रत्युत्तर में पुछा “क्यों ,बताईये ?”इस पर मेहता साहब ने कहा ,जरा मुझे मंदिर तक छोड़ देना ,भगवान् के दर्शन करने हैं .श्याम को काटो तो खून नहीं .उसने मेहता साहब से पूछा “मांस ,मदिरा के सेवन के उपरान्त मंदिर ?”
उन्होंने श्याम को घूर कर देखा और जो उत्तर दिया वह आज भी श्याम के मस्तिष्क पटल पर अंकित है ‘उनका उत्तर था “श्याम! जब ईश्वर रोज सूखी दाल रोटी खिला रहा था तो हम उनका आभार प्रकट कर रहे थे ,और आज जब उन्होंने तुम्हे हमसे मिलवाया ,इतना अच्छा भोजन करवाया और स्काच भी पिलवायी ,तो क्या आज हम ईश्वर का आभार नहीं प्रकट करेगे ?आज तो विशेष आभार प्रकट करेगे “

एक ही पल में उनके उत्तर ने श्याम की धर्म,पूजा पाठ ,कर्म कांड ,पवित्रता सम्बन्धी सारी पोंगापंथी वर्जनाएं तोड़ कर रख दी .

9 comments:

  1. संस्मरणों (कहानियों) का जखीरा है तुम्हारे पास. बधाई.

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  2. भाई, बहुत सही बात है.

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  4. kya khoob vayan kiya hai. Sundar kahani likhi hai aapne.

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  5. Ultimate truth of life......We should all b thankfull to god at every second of our life....
    Very nice story

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  6. Very true.What we eat or drink does not influence our faith.Thanks.

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  7. Very true.What we eat or drink does not influence our faith.Thanks.

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  8. मंदिर तो पूजा का केवल एक प्रतीक स्थल है।ईश्वर तो हमारे शरीर मे ही विंद्यमान है। क्या किसी दुराचारी शाकाहारी की पूजा स्वीकार हो सकती है। मै तो सत्कर्म को ही पूजा मानता हूँ

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