पश्चाताप
आज
भी कभी कभी अकेले में बैठा होता हूँ तो एक विचार मेरे मस्तिष्क में अक्सर कौंधता
रहता है कि क्या मुझसे कोई बहुत बड़ी भूल हो गयी जो आज भी राधू अडसठ वर्ष की आयु
में भी कुंवारी बैठी है या फिर उसके भाग्य में विवाह था ही नहीं?
राधू
मेरी बहन की अध्यापिका होने के साथ साथ उसकी सहेली भी थी और मेरी कोई बड़ी बहन ना
होने के कारण उसको ही बड़ी बहन समझता था. उसकी आयु बढती जा रही थी और अत्यंत
प्रयासों के उपरांत भी कोई योग्य वर नहीं मिल रहा था . उसके माता पिता भी इस विषय को लेकर चिन्तित रहते
थे .उन दिनों मैं एक विश्वविद्यालय में
स्थित बैंक शाखा में कार्यरत था .मेरे घर में अक्सर राधू मेरी छोटी बहन के साथ आ
जाया करती थी .
एक
बार मैं शाम को घर पंहुचा तो देखा राधू और मेरी छोटी बहन घर पर आये हुए हैं .कोई
विशेष बात तो थी नहीं.लेकिन थोड़ी देर में मेरी छोटी बहन मेरे पास आयी और कहने लगी
कि राधू आपसे कुछ बात करना चाहती है .मैं सोचने लगा कि आज राधू को मुझसे कोई विशेष
बात करनी होगी नहीं तो सदा मुझसे सीधी बात करने वाली राधू ,बात करने के लिए किसी और
को माध्यम क्यों बना रही है मेरे पूछने पर उसने बताया कि कल वो किसी सेमीनार में
दिल्ली गयी हुई थी और जब वो बस से वापस लौट रही थी तो बस में एक हैण्डसम सा युवक
उसकी ओर टकटकी लगा कर देख रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे वो मुझसे कुछ बात करना चाह
रहा हो लेकिन संकोचवश कुछ कह नहीं पा रहा था . इतने में मेरा गंतव्य आ गया और शायद
उसे कहीं आगे जाना था .जैसे ही मैं नीचे उतरी ,उसने मेरे हाथ में एक छोटी सी कागज़
की पर्ची दी और और बस में सवार हो कर चला गया .राधू ने वह पर्ची मेरे हाथ में दी
जिसमे लिखा हुआ था “ पता नहीं क्यों मुझे आप का चेहरा बहुत पसंद आ गया है और आपके
प्रति अपने आकर्षण को मैं रोक नहीं पा रहा हूँ .संयोगवश मैं कुंवारा हूँ और आपसे
विवाह करना चाह रहा हूँ,यदि आप भी कुंवारी हैं एवं आपको मैं भी पसंद हूँ तो मुझे
निम्न पते पर संपर्क करें.”उस पर्ची में जो पता लिखा हुआ था वो उसी विश्वविद्यालय,जिसमे
स्थित बैंक शाखा में मैं कार्यरत था ,के किसी विभाग में शिक्षा प्राप्त कर रहे
विद्यार्थी का था .राधू का कहना था कि भाई साहब इस बन्दे के बारे में पता करो
.राधू के बात करने के अंदाज़ से ऐसे लग रहा था कि यदि सब कुछ ठीक ठाक हो तो तुरंत
विवाह कर लिया जाये. और मैं पर्ची देख कर असमंजस में था कि क्या करूं.?
खैर
मैं पर्ची के सहारे दूसरे दिन उस युवक को ढूँढने निकला और पाया कि वह तो मुश्किल
से इक्कीस वर्ष का युवक और राधू सत्ताईस वर्ष की ,बिलकुल बेमेल ! राधू तो अच्छा
खासा कमा रही है और इन महाशय के करियर का अभी कुछ पता नहीं ,कुछ सोचते सोचते ,बिना
उस युवक से मिले ही मैं वापस आ गया और राधू को मैंने बता दिया कि यह युवक तुम्हारे
कतई योग्य नहीं है ,इसको तुम भूल जाओ.राधू बेचारी बड़ी हताश सी वापस चली गयी.
इस
बात को आज लगभग पैंतीस वर्ष बीत चुके हैं और मैं लगभग इस घटना को भूल ही गया था कि
अचानक एक दिन पता चला कि राधू भी उसी शहर में रहती है जिसमे मैंने भी सेवा
निवृत्ति के उपरांत अपना आशियाना बनाया है .पता ढूँढ़ते हुए उसके घर पत्नी सहित
पंहुचा ,हाल चाल प्राप्त किया .अचानक से बहुत बूढी सी दिखने लगी थी और अभी तक
कुंवारी थी.किसी स्नातकोत्तर महाविद्यालय की प्राध्यापिका के पद से सेवा निवृत्त
हो कर इसी शहर में सेटल हो गयी थी.उसका आना जाना हमारे घर में शुरू हो गया था .
वैसे भी इस शहर में उसका जानने वाला कोई नहीं था .
एक
दिन राधू हमारे घर में आयी हुई थी और पत्नी के साथ उसकी गपशप चल रही थी ,कि पत्नी
ने राधू से पूछा कि राधू तुम्हे कोई मिला ही नहीं या तुमने स्वयं विवाह नहीं किया
?इस पर राधू ने कुछ ना बोलकर मेरी ओर कातर द्रष्टि से देखा जैसे मैंने ही उसका
विवाह नहीं होने दिया ,और उसकी आँखों से बरबस आंसूं गिरने लगे .उसके बाद राधू कभी
भी हमारे घर नहीं आयी ,मेरे फोन करने पर भी कोई जवाब नहीं मिलता.
“जब चला था तीर तब इतना
पता ना चला ,.
एहसास तब हुआ जब कमान
देखी अपनों के हाथ में…!!”
आपने ऐसी तो कोई गलती नहीं ही की थी, जो उसका यह सीला दिया गया। वाक्या उस सदी का है, तब जोड़े बनाये जाते थे, खुद नहीं ढूंढे जाते थे। कसूर तो उसके परिवार के सदस्यों का या फिर उसकी तकदीर का है, जो उसे जीवन साथी न मिल सका। आपने निस्वार्थ ही उसका भला छह था।
ReplyDeleteआपने ऐसी तो कोई गलती नहीं ही की थी, जो उसका यह सीला दिया गया। वाक्या उस सदी का है, तब जोड़े बनाये जाते थे, खुद नहीं ढूंढे जाते थे। कसूर तो उसके परिवार के सदस्यों का या फिर उसकी तकदीर का है, जो उसे जीवन साथी न मिल सका। आपने निस्वार्थ ही उसका भला छह था।
ReplyDeleteशायद आप सही हैं , परन्तु उसकी प्रतिक्रिया ने मुझे सोचने पर मजबूर किया!
ReplyDeletebahut acchhi hai
ReplyDeleteधन्यवाद ,एक वर्ष के उपरांत कहानी पढने और पसंद करने के लिए .
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