Thursday, April 2, 2015

क्रिसमस गिफ्ट



दो वर्ष पूर्व हम अपने बेटे के पास गोवा में थे मेरी दोनों प्यारी सी पोतियाँ काव्या और किआरा सारे दिन हमारे आस पास मंडराती रहती और बाल सुलभ क्रीडाओं से हमारा मनोरंजन करती रहती .क्रिसमस पास आ रहा था और सारे छोटे बच्चों में एक ही कौतुहल था कि इस बार सैंटा क्या गिफ्ट देगा ?  काव्या थोड़ी बड़ी लगभग सात साल की हो गयी है और समझदार भी है और किआरा मात्र एक ही साल की अभी छोटी है . काव्या कैथोलिक स्कूल में पढ़ रही थी और जाहिर है कि उसके स्कूल में क्रिसमस को लेकर काफी तैय्यारियाँ चल रही थीं .रोज स्कूल से लौटने के बाद एक ही बात पर चर्चा होती कि सैंटा इस बार क्रिसमस की पूर्व रात्रि में मौजों में क्या गिफ्ट रख कर जाएगा.माता पिता भी समझाते कि जो बच्चे पढ़ाई में अच्छे होते हैं उनके लिए सैंटा बड़ा गिफ्ट रखता है और जो लोग पढ़ते नहीं हैं और माँ बाप का कहना नहीं मानते ,उनके लिए तो सैंटा गिफ्ट ही नहीं रखता है .आजकल काव्या अच्छे बड़े गिफ्ट के चक्कर में खूब पढाई भी कर रही थी और माँ बाप का कहना भी अच्छे से मान रही थी . आजकल उसको खाना खिलाने के लिए भी विशेष प्रयास नहीं करने पड़ रहे थे . काव्या की कल्पना में यह भी आ रहा था कि इतनी छोटी जुराब में आखिर कितना बड़ा गिफ्ट आयेगा?एक दिन उस से यह पूछने पर कि आखिर वो सैंटा से क्या गिफ्ट चाहती है ,उसने बताया कि उसे “बार्बी स्ट्रोली” चाहिए(यह एक प्रकार का छोटा सूटकेस होता है जिसमे विभिन्न प्रकार ,पहनावे ,परिवेश वाली कई बार्बी डॉल के अतिरिक्त उनसे सम्बंधित सभी आभूषण ,सौदर्य सामग्री एवं वेशभूषाएं करीने से रखी होती हैं )यह आइटम आजकल अभिजात्य वर्ग की बालिकाओं में काफी प्रचलित भी है और काफी मंहगा भी.शायद अपनी किसी सहेली के पास देखा होगा .बार बार अपनी दादी से पूछती कि सैंटा उसका गिफ्ट लाएगा कि नहीं ?दादी द्वारा अनभिज्ञता प्रकट करने पर थोड़ी उदास हो जाती .बेटे ,बहू से बात पूछने पर कि यदि इसको यह गिफ्ट ना मिला तो क्या होगा ? इसका तो दिल टूट जाएगा .तरह तरह की कहानियाँ चल रही थी कि सैंटा तो अपनी स्लेज गाडी में सारी दुनिया के बच्चों के लिए गिफ्ट ले कर चलता है और सब के लिए बार्बी स्ट्रोली तो ला नहीं सकता ,और बार्बी स्ट्रोली तो जुराब में आ ही नहीं सकती  आदि अदि .एक दिन काव्या अपनी दादी से बात कर रही थी कि सैंटा को तो गॉड भेजते हैं और गॉड को हर बच्चे के दिल की बात पता होती है इसलिए मेरी बार्बी स्ट्रोली तो आनी ही चाहिए.अंत में जब कौतुहल बहुत बढ़ गया और कहीं से भी उसकी जिज्ञासा का मन मुताबिक उत्तर नहीं मिल पा रहा था ,तो उसके मन में एक उपाय आया और उसने सैंटा को एक हरी स्याही से बहुत सजाकर पूरे पेज में  एक पत्र लिखा जो कि निम्नवत था  -
“can you give me Barbie Strolly,Dear Santa” from Kavya
Santa pls can you give me ,yes or no

अब चौबीस दिसम्बर आ गया था और उसकी आतुरता अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुकी थी. घर के सभी लोग इस असमंजस में थे इसका ऐसा क्या हल निकाला जाए कि जिस से कि उसे लगे कि सैंटा को पता था कि काव्या को क्या चाहिए और ऐसा गिफ्ट जिसे पाकर वो खुश भी हो जाए .आखिर उसकी दादी ने उस से पूछ ही लिया की यदि सैंटा बार्बी स्ट्रोली ना ला पाया तो कोई और गिफ्ट भी चल सकता है ?उसे यह भी बताया गया की उसके दादू का सैंटा दोस्त है और दादू के कहने पर वो कुछ ना कुछ तो लायेगा ही .बहुत सोचने के बाद उसने बताया कि यदि बार्बी स्ट्रोली नहीं तो “बार्बी शैम्पू” चल सकता है .यह पता चलने पर कि सैंटा दादू का दोस्त है ,उसको यह आभास हो गया कि कुछ ना कुछ तो गिफ्ट आयेगा ही.खैर! शाम को मैं पत्नी के साथ पणजी जाकर बार्बी शैम्पू ले आया .हाँ एक बात तो बताना ही भूल गया कि  काव्या ने जुराब की जगह एक बड़ा सा बैग लेकर उसमे अपनी चिट्ठी रखकर बहुत सहेज कर रात को बालकनी में रख दिया .उसको लगा कि उसकी बार्बी स्ट्रोली तो जुराब में आएगी नहीं .रात को लगभग बारह बज चुके थे और काव्या की आँखों में नींद का कोई नामो निशाँ नहीं था.
कौतुहल वश हर दस मिनट बाद जा कर बैग को देख आती .ऐसा लगता था जैसे कोई अनाडी बीज बो कर पानी देकर हर घंटे बीज निकाल निकाल कर देख रहा हो कि पेड़ उगा कि नहीं ?
यह एक ऐसी स्थिति थी जिसमे सभी लोग उसके बाल कौतुहल को एन्जॉय भी कर रहे थे और इसके पटाक्षेप को सोच कर परेशान भी हो रहे थे . किसी प्रकार उसे यह कह कर सुलाया गया कि सैंटा बच्चों के सोने के बाद ही गिफ्ट रखता है .उसके बैग से चिट्ठी निकाल कर बार्बी शैम्पू रख दिया गया .
सुबह सवेरे उठते ही वो बालकनी की ओर भागी और अपना बैग चेक किया तो उसे लगा कि कुछ तो बैग में है ,देखने पर पता चला कि बार्बी शैम्पू ! अब तो उसकी ख़ुशी का पारावार ना था . ख़ुशी के मारे उसके मुंह से किलकारियां निकल रही थी. उसको विश्वास हो गया था कि गॉड ने उसकी पहली नहीं तो दूसरी इच्छा पूरी कर दी है.अब वो भाग भाग कर अपनी सहेलियों को अपना गिफ्ट दिखा रही थी और उसकी सहेलियां भी उसके गिफ्ट को इर्ष्या की दृष्टि से देख रही थी.
इस वर्ष दीपावली पर बेटा और उसका परिवार लखनऊ आया हुआ था .काव्या पहले से ज्यादा समझदार हो गयी थी .पता नहीं कैसे मेरे कागजों में उसे दो वर्ष पूर्व उसकी सैंटा के नाम की चिट्ठी उसके हाथ लग गयी और उस चिट्ठी को लेकर मेरे पास आयी और कहने लगी “तो आप ही मेरे सैंटा थे?”मैं धीरे से मुस्कुरा दिया और बचपन में पढ़ी श्री राहुल शर्मा की एक कविता याद आ गयी –
चलो फिर ढूंढ लें हम !उसी मासूम बचपन को !
उन्ही मासूम खुशियों को !उन्ही रंगीन लम्हों को !
जहाँ  गम का पता  था !जहां बस मुस्कुराहट थी !
बहारें ही बहारें थी !
चलो फिर ढूंढ लें हम !उसी मासूम बचपन को !
जब सावन बरसता था !तो उस कागज की कश्ती को !
बनाना और डूबा देना !बहुत अच्छा सा लगता था !

और इस दुनिया का हर चेहरा !बहुत सच्चा सा लगता था !

4 comments:

  1. वाह. बहुत सुन्दर लिखा है अपने. बच्ची बड़ी प्यारी है. अच्छा लगा पढ़ कर.

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  2. बालमन निश्छलता का अति सुन्दर पर्स्तुतिकरण

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  3. सुन्दर प्रस्तुतीकरण

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